পাতা:গৌড়লেখমালা (প্রথম স্তবক).djvu/২০

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লেখমালা।

खण्डितारातिः श्लाघ्यः श्रीवप्यट स्ततः॥(৩)
मात्‌स्य‑न्याय मपोहितुं प्रकृतिभि र्लक्ष्म्याः करं ग्राहितः
श्रीगोपा-
इति क्षितीश-शिरसां चूड़ामणि स्तत्‌सुतः।
यस्यानुक्रियते सनातन-यशोराशि र्दिशामाशये
श्वेतिम्ना य-
दि पौर्णमास-रजनी ज्योत्‌स्नातिभारश्रिया॥(৪)
शीतांशो रिव रोहिणी हुतभुजः स्वाहेव तेजोनिधेः
सर्व्वाणी-
व शिवस्य गुह्यकपते र्भद्रेव भद्रात्मजा।
पौलोमीव पुरन्दरस्य दयिता श्रीदेद्ददेवीत्यभूत्
देवी तस्य विनो-
१० दभू र्मुररिपो र्लक्ष्मी रिव क्ष्मापतेः॥(৫)
ताभ्यां श्रीधर्म्मपालः समजनि सुजन-स्तूयमानावदानः
स्वामी भूमी-
११ पतीना मखिल-वसुमती-मण्डलं शासदेकः।
चत्वार स्तीरमज्जत्-करिगण-चरण-न्यस्तमुद्राः समुद्रा
यात्रां य-
१२ स्य क्षमन्ते न भुवन-परिखा विश्वगाशा-जिगीषोः॥(৬)
यस्यिन्न द्दामलीला-चलित-बलभरे दिग्‌जयाय प्रवृत्ते
यान्त्या-
१३ म्बिश्वम्भरायां चलित-गिरि-तिरश्चीनतां तद्वशेन।

^(৩)  অনুষ্টুভ্।

^(৪)  শার্দ্দূল-বিক্রীড়িত। এই শ্লোকের “করংগ্রাহিতঃ” মূল লিপিতে “করঙ্গ্রাহিতঃ” রূপে উৎকীর্ণ আছে। “গৌড়ের ইতিহাসে” তাহাই “করোগ্রাহিতঃ” রূপে মুদ্রিত হইয়াছে। এই গ্রন্থের মুদ্রিত পাঠে কত ভ্রমপ্রমাদ আছে, বাহুল্যভয়ে তাহা উল্লিখিত হইল না।

^(৫)  শার্দ্দূল-বিক্রীড়িত।

^(৬)  স্রগ্ধরা।

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