প্রধান মেনু খুলুন

পাতা:অনাথবন্ধু.pdf/১৪৮

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R अनावबन्धु । wr-r rr r मार्थकता समभाने में किसी प्रकार की यथासाध्य त्रुटि न की YS S DD DDD DBDBBB SYD DBD Y DDB YS BD धनहीन हैं। दरिद्रता नाना प्रकार के दीर्थों का भाखार है । वास्तव में दरिद्र के समान चनाथ इस भ्रमलख पर दूसरा नही मिल सकता। वे अभाव की पूर्ति के निमित क्या नही कर बैठते "दरिद्रता भी कई प्रकार की होती हैं । आजकल इमारे देशसे शिल्पविद्या का लोप हो गया है इस से अर्थ संग्रह का पथ संकीर्ण हो गया है। बहुत से लोग एसे हैं जो परिश्रम करने को तयार हैं परन्तु उनकी कार्यक्षेत्र नहीं दीखता यदि यह कहा जाय कि कृषि और नौकरी ये ही दी हार जीवन निर्वाह के खुले हैं ती अच्युति न होगी। चास की जमौन भी बंट जाने के कारण एसी हो गई है जैसे एक मांस के टुकड़े पर कई एका मांसाहारी पचियों की दृष्टि ही ओर एक दूसरे से कौन लेने की चेष्टा करता हो। अत मे परिणाम यह होता है कि जी कुछ पृथ्वी जिम के हाथ लगी भी तो उससे उसके साल भरके भोजन का निर्वाह भी उचित रूप से नहीं हो सकता। परन्तु वैज्ञानिक रीति से यदि ईती की जाय तो थोड़ी जमीन में अधिक फसल उपज सकती है। इसकार्य के भी उपाय इस पचिका में लिखे जायँगे। नौकरी का भी यह हाल है कि जनसंख्या तो अधिक है पर काम उतना नहीं परिणाम मयूरी कम मिलती है इसलिये यदि नौकरी को भीखमारी कहा जाय तो असन्भव वर्णन नहीगा। इममे ज्ञात होता है कि शिल्पोन्नति ही से दैशका करूयाण ही मकता है किन्तु केवल इस विषय पर लेख लिखने ही से कार्य मिड़ि नहीं हो सकती अम्तु शिक्-िपथों को हाथ से कलम से काम करना सिखाना होगा इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये हमलोग "अध्रपूर्या आश्रम' नाम का एक कार्यालय स्थापित कर रहे हैं। दूम देश के समस्त आवश्यकीय पदार्थ, निपुण शिरुपी हारा इस आयन ( कार्थालय ) में बनाकरेंगे एवं उसका खर्च पीसा कर स्रों दाम मे' बेचने का बन्दीवत किया जायगा । जी खोग शिल्पबिदा सीखने आवेंगे वे काम अ की तरह जानलेने पर इसी आयम में कार्य पाया करेंगे। इम की एक आदर्श कार्यालय बनाया जायगा। अभी इसका कार्थ सामान्य रूप में होता दख किसी को निरुत्साह नहीं होना चाहिध । अनेक कार्थ चैच में इसी तरह सामान्य रूप में कार्थ प्रारम्भ हो कर बड़े रूप में परिणत होते देखा गया है। विलायत के अीक्शफोर्डशायर में मैंगबेल नाम का एक छोटा सा ग्राम है। १२४४ ई० में विशप वारिंगटन ने इसी ग्राम में एक कोटासा कायालय स्थापित किया था। उसमें, केवल खर्च भरलकर बिना देदेंगे। ~ ா-ா मुनाफे खाने की चीजें बिका करती थीं । यहीं धीरे धीरे ठनजौवौ लोगों की बनाई वस्तु बिना लाभ के बेची जाती, उसौसे अमजीवियों को उनके परिश्रम का मूल्य दिया जाता था, किन्त कार्यालय केवल खर्चभर लेकर ही उन वस्तुओं को बेचा करते इस कारण और ब् बसाड़यों की अचा सस्ते दामों में इस कायलय के द्रब्य बिका करतथे। इस तरह सारे इंगलैंड में इस कार्यालय की शाखा फेल गई। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त में १३ लाख ४ २ हजार मनुष्थ इसके कार्थकता हो गए एवं इसका मूलधन पौने अठाइस करोड़ रुपया, और रिजर्व तहवील एक करीड़ बीस लाख रूपया उपस्थित रहने लगा । फलत: यदि धार्मिक कर्तव्यनिष्ठ लोग इसतरह कार्य में हुस्तक्षेप करें ती सफलता अवश्यमेव प्राप्त होगी । हुसलीग इतनी उचाभिलाष नष्कर, जिसमें कारवार में सफलता ही वेसी ही चेष्टा करेंगे। ‘अनाथबन्ध.’ इसतरह कार्य चलाने की प्रणाली नियत कर ‘अन्नपूर्ण आश्रम’ को आदर्श रूप में लाने की चेष्ठा में तत्पर होंगे । उच्च घराने की वियां यदि घर में बैठकर किसी प्रकार की शिल्पकला भूषित वस्तु तयार कर आश्रम के कार्थ संरक्षकों की प्रदान करें तो वे उन्हे, वस्तुको उचित मूल्यपर बेचकर दाम आग्रम में भी स्त्रियों के कार्य करने की व्यवस्था रहगी। चतुर्थ ग्रेलौके अनाथ :-जी रोग ग्रसित हैं उनकी पौड़ा हरण के भी आयोजन इस आयम में रहेंगे। एलीपैथिक, हीमिग्री पैथिक, कविराजी और हकीमी एलाज बिना मूल्य किये जायंगे किन्तु दु:ख के साथ लिखना पड़ता है कि रोगियों के रहने का स्थान अभी आश्रम न दे सकेगा। अनाथवन्ध, जिसमें प्रक्तपक्ष में अनाथवन्धु का काम कर सके एसी चेष्टा तन मन धन् से की जायगी। उस अनाथवन्धु, जगदीश्वर से तथा आप महानुभावों से इस आश्रम से सहानुभूति एवं छापा रखने कौ प्रार्थना करता झुचा आशा करता हूं कि आप लोग इस निवेदन की पढ़कर ही न रह जायं वरन दूस पर विचार करें कि जिस विषय की हम ने हाथ में लिया है उसका महत्व कितना हैं। यह कार्थ अति गभीर ह और बिना आपलोगों की सहायता के पूरा नहीं हो सकता। आजकल ऐसी हमलोगों की अवस्था हो रही है कि प्रत्येक मनुष्य यह सीच कर कि हम अकेले क्या कर सकते हैं, बैठ रहता है इसी से हमने पूर्व ही कहा है कि हम अपने की भूलगये। हस सब कर सकते हैं। आज हमारे कितने भाई एक समय भी उदर पूर्ति नहीं कर सकते इसका मुख्य कारण यही है। कि एक दूसरे की सहायता द्वने में कभी अग्रसर नहीं होता।