প্রধান মেনু খুলুন

পাতা:অনাথবন্ধু.pdf/১৪৯

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हमारा केवल विनीत निवेदन करने ही तक का अधिकार है इसके बाद सहाय प्रदान करना आप ही लोगों के हाथ है। आशा है हमारी प्रार्थना निष्फल नहीगी । ( R ) मैंने बहुत विचार कर कई वर्षों तक अनुभव करके और किसी वड़े उद्देश्य की लच कर यह ‘अनाथबन्धु” प्रकाशित किया है। इस में मेरा अपना कोई खार्थ नहीं क्यों कि व्यवसाय हारा अबतक जी कुछ मैंने उपार्जन किया है और ईश्वर ने जी कुछ मुझे दिया है उसीसे में सन्तुष्ट हूं। निर्मल निकलह आनन्द उपभोग करने की इकामें-इतना हड़ ही जाने परभी "अनाथबन्धु" प्रकाशित कर उसके पौछे पीछे अन्नपूर्ण आश्रम स्थापित करने की अभिलाषा की है। मुझे मदा पूरी चाशा रहती है कि ईश्वर मेरे कर्म का सहायक है। जोड़ी इस अनाथबन्धु की प्रथम संख्या निकल जाने पर मुझे मालूम हुआ कि :- १। बहुत से लीग बङ्ग भाषा नहीं जानते-समझते भी नहीं इसौ से 'अनाथबन्धु" उन्हों ने लौटा दिया। परन्तु जिनलोगों के पास यह पचिका भेजी गई वे सभी गण्यमान्य सज्जन हैं अन्तु यदि वे कि ही बङ्गभाषा जानने वाले सज्जन से पढ़वाकर इस में लिवि लेख सुनते तो वे लेखों के लाभ मालूम कर सकते आश्रम की प्रतिष्ठा एक महत् कार्थ है यदि सर्वच इसी प्रकार आग्रम स्थापित ही जाय तो जगत् के सभी लोग इस से लाभ उठा सकें। बहुत लोग इस आश्रम द्वारा भोजन वस्त्रादि लाभ कर एवं रीग शोक में औषधि और सान्वना पाकर आनन्दमय जीवन बिता सकेंगे। थोड़े खर्च में यह सब कार्य के नेि ही सकते हैं इसकी शिचा देना भी परमावश्यक है। इसी उद्देश्य की पूर्ति के निमित आश्रम के महायक रूप में ‘अनाथबन्धु" का प्रचार मैने किया है। रे । यह सत्य है कि धर्मनिष्ठपुरुष प्राय: प्रपंच हारा ठगे जा चुके हैं इसी कारण से अब सब का ए मे काव्य की ओर अविश्वास हो गया है और सत् कार्य की और अग्रद्धा मी ही गई है। मेरा तो कहना केवल यह है कि यदि आप किमी ण में सहायता के काम में हास हो चुके हैं तो उसपर विचार कवि व कि कीं ? दशा काल पाच दून तीनों पर विचार कर कार्य करने मे किसी विषय में धीखा नहीं उठा सकने और न सल्कम की और अभक्ति ही होती है। मेंगी उम्र प्राय: ७० वर्ष की ही गई। मैं बिगत ५० वर्षों में व्यवसाय कर रहा हूं और अपने अनुभव तथा धैर्यवश में अवभी और अन्नपूसी अग्रम के उद्देश्य भी समझ सकते। । निवेदन । । -ܣܦܩܚ- ܣܡܩܝܦܗ கம்=உம் Aha. एक बड़ा व्यवसाय चला रहा हूं। ईश्वरेच्छा से, भारतवर्ष, योरीप एवं एमरिका के सभी महत् व्यक्तियों से मेरा व्यवसाई सम्बन्ध है परन्तु आज तक मेंरे ऊपर उन महानुभावों का स्थायी विश्वाम एवं ग्रड़ा ज्यों की त्यों चली आरही है। भरें इारा किमी प्रकार के प्रपंच की सम्भावना है या नहीं यह बात भरे बहुत में पूज्य तथाबन्धुगण जानत हैं। ३ । अद्रपूर्णा आश्रम म्यापित करने का मै' उद्योग क६'गा । आश्रम स्थापना में प्राय: एक लाख रूपये की आवश्यकता है। कम से कम तीस पंतीस हजार रूपध ही जाने परभी मैं किमी तरह इस की आरम्भ कर सकता हूँ इसके पश्यात् सहायक वन्द के अभिग्रायानुसार आथम के कार्य की दृद्धि हो सकती है। ४। 'अनाथबन्धु' से जी कुछ आय होगी वह आग्रम के कार्ययों में व्यय हुआ कएगी। यदि इस पविका के पांच हजार ग्राहक हो जायं तो मैं समझता हूं कि फिर आश्रम के लिये अधिक सहायता की आवश्यकता नर्भी ही । इस पत्रिका की प्रथम संन्या प्रकाशित कर जैसा मैं उत्साहित किया गया हूं उस से तो मेर अभीष्ट सिद्धि में तनिक भी संद नहाँ दीखता । में पहिने ही लिख चुका हूं कि मरा खार्थ केवल ‘आनन्द” मात्र ही है। जहां तक सम्भव है मैं 'अनाथबन्धु" की सब्वसुन्दर बना आश्रम की मेवा में उपयोगी स्थान दने में कदापि तुटि न कsगा। तिमपर में अपने सहायकों बारा भी खूब उत्साहित किया जा रहा हूं। बड़े हका विषय है कि बहत से महानुभावों ने पत्रिका पाते ही अपना नाम ग्राहकों की श्रेणी में उदारता पूर्वक लिखवा सुभाकी अत्यंत उत्साहित तथा वावित किया है। उन लीगों का नाम यहां प्रकाश करना मेरी समभा में अगुचित न हीगा। बंगीघ्रद्धर हिज एक्लेलेन्सो लोर्ड कोरौंमाइकल बहादुर । सहामान्य महाराजा सोनपुर । महामान्य राजासाहब बामड़ा। अनरेबल सर महाराजा दरभङ्गा । अनरेबल सर महाराजा मनोन्द्रचन्द्र नन्दी बहादुर-कासिमबाजार । अनरेबल महाराज बहादुर-नसोपुर। महामान्ध जेनेरल तेज शमसेर जङ्ग बहादुर राणा-नेपाल ।