প্রধান মেনু খুলুন

পাতা:অনাথবন্ধু.pdf/২৩৭

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निवेदन । जिस अनाथबन्धु के कर्म कला कुतूहल से हम स्वप्रवत संसार का चखी एक समान चल रहा है । जिसने हम लोगों की कमयोगी होने की शिक्षा दी है, जिसने हमें यह उपर्दश दिया है कि सदा कर्म करते रही बिना कर्म किध शरीर यात्रा भी सिद्ध नही होती उसी देवादि देव कमजापति को ‘अनाथबन्धु” उभय कर जोड़ प्रणाम करता है। जी पृथ्वी का भार हरण करने के निमित युग २ में अवतार धारण करने हैं, जो अनादि अनन्त और ईश्तीय हैं, जो सब जीवों में विराजमाम हैं । रुप की तुलना नहीं। अहा ! नवदुर्वादल श्याम कान्ति पौतवसन पद्मपलासलोचन, प्रकृज मुख, कोटि २ चन्द्रमा मूर्थ जिनके पादपद्म म' मप्रकाशित हैं, वही पादपद्म इस भवार्णव पार होने की अभय तरणी है ; इस तरणी का खेवैया अनाथवन्धु ही है इसलिध इसकी शारण लेनी परमावश्यक है । यह संसार उमी लीलामथ की लीला का नमना है। संसार की जिस वस्तु पर विचार कियानाय वही ट्रस लौलामथकी आयर्थजनक लीला में लिम दीख पड़ती हैं यहां तक कि उमश्कीरनीला अनाथच्व में भी वर्तमान रहती हैं । इस विश्वमण्डल के गर्भ में अनाथ अनेक तरह के हैं। कर्मजाल में' बंध कर मनुष्य कई प्रकार से अनाथ ही जाते हैं परन्त मब अनाथों का एकमाव शरण वही अनाथशरण है उसी का दूमरा नाम अनाथवन्धुभी है। यह अनाथवन्धु उस अनाथबन्धु से अभीष्ट सिद्धि के लिग्रे प्रार्थना करता हुआ। अनेक प्रणाम करता हैं । मेंसार मे प्रथम ग्रेणी के अनाथ :-जिसकी आम बोध नहीं है । जी ममता के चंगल में पस कर अपने की तथा 3स अनाथबन्धु को भी भ्रल गया है, वह जिस समय मोह निद्रा में निधत ही जाग्टताव थामें आता है तब उसकी कवा गति होती है । जिसने विवेक शक्तिा से भी काम लेना नही सीग्वा जो सदा दग्द्ध शीक समद्र ने ही गीने लगाया करता है उसके ममान अनाथ और कौन है ? जिस सयलीकेश्वर की मत कराल से पकारने पर, पुचकखवशोकदग्ध ह्रदय में भी नन्दन कानन के पारिजात सौरभ का आविभव ही उठता है, क्षधाग्रि से जलते एि मनुष्य का दु:ख नाश ही शाति होती है उसी 'अनाथवन्ध्र,” की आपलोगों से परिचित कराने के लिधे एवं उसी अनाथबन्धु को पानेका उपाय बताने के लिये इस 'अनाथवन्धु” का आविर्भाव आज जीकसमाज मे होना समुचित है। साधकों के हितार्थ हिन्दू शास्त्र में उस दीनबन्धु के अनेकरूप तथा अनेक साधन प्रणाली लिखी YYYS DDB DDD DDDD BB D DD uDuY DDD S DDDD DDD वर्णन सरल भावसे लिखा करेगें । इसके अतिरिक्त योगशास्त्र, नैौतिशास्त्र, धर्मशास्व इत्यादि कौ साधारण बातें भौ सर्वसाधारण के समभाने योग्य भाषामे।' लिखी जायगाँ। मनुष्य जिससे संसार मे' रह कर साधन पथ में अग्रसर हो, 'अनाथबन्धु,” में उसके विशेष , उपाय बतखाये जायगे इस प्रकार यह पविका. अपने ‘अनाथबन्धु” जाम की सार्थक करने की चेष्टा करेगी । तथा जिनके दूसरी श्रेणी के अनाथ :-जो लोग सांसारिक रीति से ज्ञानहीन हैं। वर्तमान समयमें चारीतरफ जड़वस्तुओं का ज्ञान अच्छी तरह फेल रहा है। इस समय बिना ज्ञान या विद्या के संसार मे काम नहीं चल सका। हमलीय चाहैं जितने विद्वान था ज्ञानी अपने की कों न मार्नलं, किन्तु हमारा ज्ञान वालव में अयन्त संकीर्ण एवं सीमाबद्ध है। हमलोग दी एक बिषयों का सामान्य ज्ञान प्रात भले ही करलें पर में कड़ों विषयों में अनभिज्ञ रहते हैं यहां तक कि हमलोगों म' जी शिक्षित हैं, वे हृक्ष इयादि काटादिक जी उनकी आखों के सामने निथ पड़त हैं उनके भी वे गण नहीं जान । इनका गुम जानने पर मंमार का कितना उपकार ही सकता है, यक्ष लखनी इारा नहीं कहा जा सता। कमें दु:खका विषय है कि लता, वृक्ष रूप में श्रीषधि रहते हुए भी वहुधा ओषधियों का ज्ञान न रहने के कारण प्राण हरण ही जाता है इस अवस्था में हमलोगों से बढ़ कर अनाथ और कौन हैं ? दूम श्रेणी के अनाथों की शिक्षा के लिय ‘अनाथबन्ध ” म' इस विषय के जानकागों के मुन्दर २ लैंग्व प्रकाशित हुआ करेंग। इसके मिवाथ कृषि, शिल्प. वाणिज्य, समाज-विज्ञान, अर्थशाव. चिकि का शास्त्र, ( एलोपथिक एवं वैद्यक ) द्वतिहास, विज्ञान, दर्शन DDDDSSYKD D DDg DS tDDDS DBDBBDD DDDD DDD DS प्रकाशित हुआ करंग । सारांएयह कि राजनीति के अतिरित सभ। जानने योग्य विषय अनाथवन्ध, म प्रभाशित हुआ करेंगें। द्वितीथ ग्रणी के अनाथों की इस 'अनाथछन्धु नावी पचिका"को सार्थकता ममझाने में किसी प्रकार की यथामाध्य त्रुटि न की जायगी। टतीय श्रेणी के अनाथ :-जी दरिद्र हैं संसार म' जो धनहीन हैं। दरिद्रता नाना प्रकार के दोषों का भागङ्गार है। वास्तव में दरिद्र के समान अनाथ इस भ्रमण्डल में दूसरा नहीं मिल सकता। वे अभाव की पूर्ति के निमित का नही कर बठत दरिद्रता भी कई प्रकार की होती हैं। आजकल हमारे देशस शिल्पविद्या का लोप हो गया हैं ड्रम से अर्थ संग्रह का पथ संकीर्ण हो गया हैं । बहुत से प्रतीग एं में हैं जो परियम करने को तयार हैं परन्त उनकी कार्थ क्षेच नहीं दीखता यदि यह कहा जाय कि कृषि और नौकरी थे ही दी हार जीवन निर्वाह के रतुले हैं तो अल्युति न होगी। खेती की जमीन भी बंट जाने के कारण ऐसी हो गई है जैसे एक मांस के टुकडे पर कई एक मांसाहारी पक्षियों की दृष्टि ही चीर एक दूमर से छीन लेने की चेष्टा करता हो। अनमें परिणाम यह होता है कि जी कुछ पृथ्वी जिसके हाथ लगी भी तो उससे उसके साल भरके भोजन का निर्वाह भी उचित रूप से नहीं हो सकता। परन्तु वैज्ञानिक रीति से यदि ईश्ती की जाय तो थोड़ी जमीन में अधिक फसल उपज सकती है। इसकार्य के भी उपाय इस पविका में लिखे जायगे। नोकरी का भी थाह हाल है कि जनसंख्या तो अधिक है पर काम उतना नहीं परिणाम मजूरी कम मिलती है इसलिये यदि नौकरी की भीखमारी कहा जाय तो असन्भव वर्णन न होगा।