প্রধান মেনু খুলুন

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■ 8, আলাজমান। राजा विजयसिंह धुधुरिया। सर महाराजा प्रद्योत कुमार ठाकुर बहादुर। लाला उद्योतिप्रकाश नन्दी साहब-वईमान । महामान्य राजासाहब-लनजीगड़। মস্থানাললীয়া মহাৰালী হাস্থলা, -आयीयागढ़ । रायबहादुर ऋत्युंजय राय चौधरो-गौरीपुर । কুমাৰ হা, ঘী, ভাঙ্কিৰী-ৰাজব্বাস্থী । वोयुत प्रभातचन्द्र गिरि-ताड़केश्वर। जिन जिन मान्यवर महाशयों ने 'अनाथबन्धु' का ग्राहक वन मुझे उत्साहित किया है उनमें से उपरोना सभी सज्जन इसके पृष्टपोषक तथा अभिभावक होंगे इसमे कोई सन्देह नहीं। sाशा हे सर्वसाधारण अद्रपूर्णा आश्रम स्थापित करने के सम्वन्ध में' हुझे सहायता दले में कदापि पीछे न हटेंगे एवं ईश्वर से मेरी यही प्रार्थना चै कि, सब वस्थ चार खच्छन्दता पूर्वक दिन वितावें तथा मंगलमय जगदीश्वर के आशीवाद से इस महत कार्य में सभिखित ही जीवन सफल कf। दैशी चाथ का शिल्य तथा अयतावश्यक नवाविकृत फलदायक चौषधादि पर प्रबन्ध लिख भेजने से हमलोग उसे सादर यहण प्राचीन समयका याम्य-इतिहास, मन्दिरों के विवरण एवं कि ही की निन्दा, uiDuBLB KBD DD LGDLS YKD DBBtL DBDBDBuB BB YK ঘনিষ্কন্ধা দিন মজস্ক্রিন ল স্থানী । यदि कोई रमणी धाभिक विषयपर लेख, काव्य अथवा गीत लिख कर भेजे तो छापी जा सकती है। 'अनाथबन्धु" में कापने के सिधे बहुतसी तसवीरें जीवन चरित के साथ भिली है। चाझारे अन्य सव्षत्र भी अपना रे जीवनवृतान्त एवं चिव भेजने में देर न करेंगे। uči i विवादि भेजने पर प्रकाशित कि थ जायंगी । BLB BD D BD DD BB DDDBD DBBBD Y BBYS BD GG D D DBBK KYBBD L L DBBB LLLB चयत सहज होगा, कारण प्रधान खर्च है औक बनवाई सी ‘चनाथबन्धु ' के लिये बने ही हैं। इस विषय में सब राजाओं से सहानुभूति रखने की प्रार्थना है।

  • अन्नपूज्ञ यात्रीम”

का कार्य जिस तरह चलेगा उसका ब्योरा हन लिख ही चुके हैं चाशा है आपलोग इसकी उम्रतिशील बनाने में कुछ उठा न रकहेंगे मै' कृतज्ञता पूर्वक निवेदन करता हूं कि जिन महाशयोंने 'अनाथबन्धु" की प्रथम एवं हितीय संख्या रक्खी है और इसके उद्देश्य की समभ ग्राहक ही गए हैं वे अबकी संरक्या पा5 ही वाषिक मूल्य भेजकर मुझे वावित करें। पहिले ही कह चुका हूं कि 'अनाथबन्धु" की आय आश्रम सम्बन्ध में ही व्यय होगी अस्तु जिनलोगों की इच्छा इम आश्रम को सहायता पहुंचाना है वे इस अवसर पर दर न करें। वे जितनी जल्दी सहायता प्रदान करेंगे उतनी ही जल्दौ कार्य vaTT विशेष्त्र सु, बिधा । विद्यालय के छात्र, धर्मसभा, एवं जन साधारण के उपकारार्थ जो लाईब्ररी हैं यह सब इस ‘अनाथबन्धु” को आधे दाम में पावेंगे। इसमें हिन्दी के लेख भी निकला करेंगी । fcmm :ー श्रीवालोप्रसन्त्र सुखोपाध्याय W霄T@高 1 annual