গৌড়লেখমালা (প্রথম স্তবক)/দেবপালদেবের তাম্রশাসন


 

দেবপালদেবের তাম্রশাসন।

[মুঙ্গের লিপি]
প্ৰশস্তি-পরিচয়।

 ১৭৮০ খৃষ্টাব্দে মুঙ্গের-নগরে কৰ্ণেল ওয়াট্‌সন্ কর্ত্তৃক এই তাম্রপট্টলিপি আবিষ্কৃত হয়। তৎকালে এরূপ প্ৰাচীন লিপি পাশ্চাত্য পণ্ডিতবৰ্গের নিকট সুপরিচিত না থাকায়, ইহাতে এক নূতন আবিষ্কার-কাহিনী। কৌতূহল সমুদ্ভূত হইয়াছিল। ইহা পালবংশীয় তৃতীয় নরপাল দেবপালদেবের ভূমিদানপত্ৰ; মুঙ্গের-নগরে আবিষ্কৃত হইয়াছিল বলিয়া, এক্ষণে “মুঙ্গের-লিপি” নামে সুধী-সমাজে অভিহিত হইয়া আসিতেছে। এসিয়াটিক্ সোসাইটির পত্রিকায়[১] [১৭৮৮ খৃষ্টাব্দে] এই তাম্রপট্টলিপির একটি লিথোগ্ৰাফ মুদ্রিত হইয়াছিল। তাহাতে লিপিকর-প্রমাদের অভাব ছিল না। কিন্তু তাহাই এখন একমাত্ৰ অবলম্বন। কারণ, মূল তাম্রপট্টখানি হারাইয়া গিয়াছে। কিরূপে কাহার নিকট হইতে হারাইয়া গেল, তাহার সন্ধান প্রাপ্ত হওয়া যায় না।

 ১৭৮১ খৃষ্টাব্দে চার্লস্ উইল্‌কিন্স্ এই প্ৰাচীন লিপির পাঠোদ্ধার করিয়াছিলেন। কিন্তু তাঁহার উদ্ধৃত পাঠ মুদ্রিত হয় নাই। সুতরাং কিরূপ পাঠ উদ্ধৃত হইয়াছিল, তাহা জানিবার পাঠোদ্ধার-কাহিনী। উপায় নাই। এসিয়াটিক্ সোসাইটি যে লিথোগ্ৰাফটি মুদ্ৰিত করিয়াছিলেন, তদবলম্বনে [অশেষ অধ্যবসায়-বলে] অধ্যাপক কিল্‌হর্ণ যে পাঠ উদ্ধৃত ও অনূদিত[২] করিয়া গিয়াছেন, তাহাই এখন এই প্ৰাচীন লিপির মূলানুগত প্রকৃত পাঠ বলিয়া মর্য্যাদা লাভ করিয়াছে। ইহার জন্য অধ্যাপক কিল্‌হর্ণকে কিরূপ ক্লেশ স্বীকার করিতে হইয়াছিল, তাহা সহজেই অনুমান করা যাইতে পারে। অন্যান্য প্ৰাচীন লিপির পাঠোদ্ধার-সাধনে অধ্যাপক কিল্‌হর্ণ যেরূপ জগদ্বিখ্যাত খ্যাতিলাভ করিয়া গিয়াছেন, তাহাতে তাঁহার গৃহীত পাঠ মূলানুগত বলিয়া স্বীকৃত হইতে পারে।[৩]

 পাঠোদ্ধার করিয়া, চার্লস্ উইল্‌কিন্স্, তাহার মর্ম্ম ইংরাজি ভাষায় লিপিবদ্ধ করিয়াছিলেন। তাহা সুপণ্ডিত স্যর উইলিয়ম্ জোন্সের টিপ্পনীসহ সোসাইটির পত্রিকায় [১৭৮৮ খৃষ্টাব্দে] ব্যাখ্যা-কাহিনী। মুদ্রিত হইয়াছিল। কিন্তু পাঠোদ্ধার-শৈথিল্যে এবং ব্যাখ্যা-বিভ্রাটে দেবপালদেব [ধর্ম্মপালের ভ্রাতা] বাক্‌পালের পুত্র বলিয়া পরিচিত হইয়া পড়িয়াছিলেন। এখনও অনেকের প্রবন্ধে ও গন্থে এই ভ্রম সংক্রামিত হইয়া আসিতেছে। কিন্তু অধ্যাপক কিল্‌হর্ণ যেরূপ পাঠ উদ্ধৃত করিয়া গিয়াছেন, তদনুসাবে দেবপালদেব এই তাম্রশাসনে আপনাকে ধর্ম্মপালদেবের পুত্র বলিয়াই [একাদশ শ্লোকে] আত্মপরিচয় প্রদান করিয়া গিয়াছেন। এ পর্য্যন্ত এই পুরাতন লিপির বঙ্গানুবাদ প্রকাশিত হয় নাই; কোন কোন গ্রন্থে এবং প্রবন্ধে এই লিপির মর্ম্মমাত্রই আলোচিত হইয়াছে।

 এই তাম্রশাসনখানি অক্ষুণ্ণ অবস্থায় প্রাপ্ত হওয়া গিয়াছিল। কিন্তু লিথোগ্রাফ করিবার সময়ে “যদ্দৃষ্টং তল্লিখিতং” করিতে গিয়া, লিপিকর অনেক স্থলেই সকল অক্ষর ও চিহ্ন যথাযথরূপে লিপি-পরিচয়। উদ্ধৃত করিতে পারেন নাই। অনেক স্থলে লিপি-প্ৰমাদগুলি সংস্কৃতজ্ঞ পাঠকের নিকটে অক্লেশেই প্রতিভাত হয়। অধ্যাপক কিল্‌হর্ণ সে সকল স্থলে বিশুদ্ধ পাঠই উদ্ধৃত ও মুদ্রিত করিয়া গিয়াছেন। তাম্রফলকখানির আয়তন কিরূপ ছিল, এখন আর তাহা জানিবার উপায় নাই। লিথোগ্রাফ দেখিয়া বুঝিতে পারা যায়,—ইহাতে একটি রাজমুদ্রা সংযুক্ত ছিল, এবং তন্মধ্যে “শ্রীদেবপালদেবস্য” এই কয়টি অক্ষর খোদিত ছিল। তাম্রপট্টের প্রথম পৃষ্ঠে ৩৩ পংক্তি এবং দ্বিতীয় পৃষ্ঠে ১৬ পংক্তি (সংস্কৃত ভাষানিবদ্ধ পদ্যগদ্যময়) লিপি উৎকীর্ণ হইয়াছিল।

 এই তাম্রশাসন উৎকীর্ণ করাইয়া, “শ্রীমুদ্গগিরি-সমাবাসিত-শ্রীমজ্জয়স্কন্ধাবার” [২৭-২৮ পংক্তি] হইতে, “পরমসৌগত-পরমেশ্বর-পরমভট্টারক-মহারাজাধিরাজ শ্রীধর্ম্মপালদেব-পাদানুধ্যাত” (২৮-২৯ পংক্তি) “পরমসৌগত-পরমেশ্বর-পরমভট্টারক-মহারাজাধিরাজ শ্রীমান্ লিপি-বিবরণ। দেবপালদেব” (২৯ পংক্তি) ঔপমন্যব-গোত্রীয় আশ্‌লায়ন-শাখার ব্রহ্মচারী বিশ্বরাতের পৌত্র, বরাহরাতের পুত্র, বীহেকরাত মিশ্রকে (৪২-৪৩ পংক্তি) শ্রীনগর-ভুক্তির অন্তঃপাতি ক্রিমিল-বিষয়ের অন্তর্গত মেষিকা গ্রাম (৩০ পংক্তি) স্বকীয় বিজয়রাজ্যের ৩৩ সংবৎসরে, ২১ মার্গ দিনে (৪৬ পংক্তি) দান করিয়ছিলেন। এই তাম্রশাসনে কবির বা শিল্পীর নাম উল্লিখিত নাই। স্যর চার্লস্ উইল্‌কিন্স “মুদ্গগিরিকে” মুঙ্গের এবং “শ্রীনগরকে” পাটনা বলিয়া স্থির করিয়া গিয়াছেন; কিন্তু “ক্রিমিল-বিষয়” এবং “মেষিকা” গ্রাম কোথায় ছিল, তাহা স্থিরীকৃত হয় নাই।


 

প্রশস্তি-পাঠ।

ॐ स्वस्ति॥
सिद्धार्थस्य परा[र्थ]-सुस्थिर-
मतेः सन्मार्गमभ्यस्यतः
सिद्धिः सिद्धिम-
नुत्तरा म्भगवत स्तस्य प्रजासु क्रियात्।
य स्त्रैधातुक-सत्व-सिद्धिपदवी रत्युग्र-वीर्य्योदया-
ज्जित्वा निर्वृति-
माससाद सुगतः सर्व्वार्थ-भूमीश्वरः॥(১)
सौभाग्यन्दधदतुलं श्रियः सपत्न्या
गोपालः पति रभवद्वसु-
न्धरायाः।
दृष्टान्ते [सुविनयिनां?] सुराज्ञि यस्मिन्
श्रद्धेयाः पृथुसगरा [दयो] प्यभूवन्॥(২)
विजित्य येनाजलधे र्वसुन्ध
रां
विमोचिता मोघ-परिग्रहा इति।
सवाष्प मुद्वाष्प-विलोचनान् पुन-
र्व्वनेषु बन्धून् ददृ [शु] र्मतङ्गजाः॥(৩)
च-
लत्स्वनन्तेषु बलेषु यस्य
विश्वम्भराया निचितं रजोभिः।

पादप्रचार-क्षम मन्तरीक्षं
विहङ्गमानां सुचिरं बभूव॥(৪)
शास्त्रार्थभाजा चलतोऽनुशास्य
वर्णान् प्रतिष्ठापयता स्वधर्म्मे।
श्रीधर्म्मपालेन सुतेन सोऽभूत्
स्वर्गस्थिताना मनृणः
पितॄणाम्॥(৫)
अचलै रिव जङ्गमै र्यदीयै र्व्विचलद्भि र्द्विरदैः कदर्थ्यमाना।
निरुपप्लव मम्बरं प्रपेदे श-
१० रणं रेणुनिभेन भूतधात्री॥(৬)
केदारे विधिनोपयुक्त-पयसां गङ्गासमेताम्बुधौ
गोकर्णादिषु चाप्यनु-
११ ष्ठितवतां तीर्थेषु धर्म्म्याः क्रियाः।
भृत्यानां सुखमेव यस्य सकलानुद्धृत्य दुष्टानिमान्
लोकान् सा-
१२ धयतोनुषङ्ग-जनिता सिद्धिः परत्राप्यभूत्॥(৭)
तै स्तै र्दिग्विजयावसान-समये सम्प्रेषितानां परैः
स-
१३ त्कारै रपनीय खेदमखिलं स्वां स्वां गतानां भुवम्।
कृत्यम्भावयतां यदीय मुचितं प्रीत्या नृपाणा मभूत्
सो-
१४ त्कण्ठं हृदयं दिवश्चुतवतां जातिस्मराणामिव॥(৮)
श्रीपरबलस्य दुहितुः क्षितिपतिना राष्ट्रकूट-तिलकस्य।

१५ रण्णादेव्याः पाणि र्जगृहे गृहमेधिना तेन॥(৯)
धृततनु रियं लक्ष्मीः साक्षात् क्षिति र्नु शरीरिणी
किमवनिपतेः
१६ कीर्त्ति र्मूर्त्ताऽथवा गृहदेवता।
इति विदधती शुच्याचारा वितर्कवतीः प्रजाः
प्रकृति-गुरुभि र्या शुद्धान्तं गुणै-
१७ रकरोदधः॥(১০)
श्लाघ्या पतिव्रतासौ मुक्ता-रत्नं समुद्र-शुक्तिरिव।
श्रीदेवपालदेवं प्रसन्न-वक्त्रं सुत मसूत॥(১১)
१८ निर्म्मलो मनसि वाचि संयतः काय-कर्म्मणि च यः स्थितः शुचौ।
राज्य माप निरुपप्लवं पितु र्बोधिसत्व इव
१९ सौगतं पदम्॥(১২)
भ्राम्यद्भि र्विजय-क्रमेण करिभि [:स्वा] मेव विन्ध्याटवी-
मुद्दाम-प्लवमान-वाष्पपयसो दृष्टाः पुन र्बान्ध-
२० वाः।
काम्बोजेषु च यस्य वाजि-युवभि र्ध्वस्तान्य-राजौजसो
हेषामिश्रित-हारि-हेषितरवाः कान्ता श्चिरं वीक्षिताः॥(১৩)
२१ यः पूर्व्वं बलिना कृतः कृत-युगे येनागमद्भार्गव-
स्त्रेतायां प्रहतः प्रिय-प्रणयिना कर्ण्णेन यो द्वापरे।
विच्छिन्नः कलि-
२२ ना शक-द्विषि गते कालेन लोकान्तरं
येन त्यागपथः स एव हि पुन र्विस्पष्ट मुन्मीलितः॥(১৪)

आ-गङ्गागम-महितात्
२३ सपत्न-शून्या-
मासेतोः प्रथित-दशस्यकेतु-कीर्त्तेः।
उर्व्वी मावरुण-निके[त]नाच्च सिन्धो-
रालक्ष्मी-कुलभवनाच्च यो
२४ बुभोज॥(১৫)

स खलु भागीरथी-पथ-प्रवर्त्तमान नानाविध-नौवाटक-सम्पादित-सेतुबन्ध[नि]हित-शैलशिखर-श्रे-
२५ णी-विभ्रमान् निरतिशय-घन-घनाघन-घट्टा(टा)-श्यामायमान-वासरलक्ष्मी-समारब्ध-सन्तत-जलदसमय-स-
२६ न्देहात्। उदीचीनानेक-नरपति-प्राभृतीकृता-प्रमेय-हयवाहिनी-खरखुरोत्खात-धूलीधूसरित-दि-
२७ गन्तरालात्। परमेश्वर-सेवा-समायाता-शेष-जम्बूद्वीप-भूपाल-٭ पादात-भर-नमदवनेः। श्रीमुद्गगिरि-समावा-
२८ सित-श्रीमज्जयस्कन्धावारात् परमसौगत-परमेश्वर-परमभट्टारक-महाराजाधिराज-श्रीधर्म्मपालदेव-
२९ पादानुध्यातः परमसौगतः परमेश्वर[:] परम भट्टारको महाराजाधिराजः श्रीमान् देवपालदेव[:] कुशली
३० श्रीनगरभुक्तौ क्रिमिला-विषयान्तःपाति-स्वसम्बन्धाविच्छिन्न-तलोपेत-मेषिका-ग्रामे समुपगता-
३१ न् सर्व्वानेव राणक। राजपुत्र। अमात्य। महाकार्त्ताकृतिक। महादण्डनायक। महाप्रतीहार। महासा-

३२ मन्त। महादौःसाध। साधनिक। महाकुमारामात्य। प्रमातृ। सरभङ्ग। राजस्थानीय। उपरिक। दाशा-
३३ पराधिक। चौरोद्धरणिक। दाण्डिक। दाण्डपाशिाक। शौल्किक। गौल्मिक। [क्षे]त्रप। प्रान्तपाल। कोट्टपाल[।]
३४ खण्डर[क्ष]। तदायुक्तक। विनियुक्तक। हस्त्यश्वोष्ट्र[ब]ल-व्यापृतक[।] किशोर-व[ड]वा-गोमहिषाजाविकाध्यक्ष। दूतप्रैषणि-
३५ क। गमागमिक। अभित्वरमाण। विषयपति। तरपति। तरिक गौड़-मालव-खश-हूण-कुलिक-कर्ण्णाट-ला[टचा]ट-भाट-
३६ सेवकादीन् अन्यांश्चाकीर्त्तितान् स्वपादपद्मोपजीविनः प्रतिवासिनश्च ब्राह्मणोत्तरान् महत्तर-कुटुम्बि-पुरोगमेदा-
३७ न्ध्रक-चण्डालपर्य्यन्तान् [स]माज्ञापयति। विदितम- ३८ स्तु भवतां यथोपरिलिखित-मेषिकाग्रासः स्वसी-
३९ मा-तृणयूति-गोचरपर्य्यन्तः सतलः सोद्देशः साम्रमधूकः सजलस्थलः समत्स्यः सतृणः सोपरिकरः सदशा-
४० पराधः(?) सचौरोद्धरणः परिहृत-सर्व्वपीड़ः। अचाटभट-प्रवेशोऽकिञ्चित्-प्रग्राह्यो राजकुलीय-[समस्त]-प्रत्यायसमे-
४१ तो भूमिच्छिद्रन्यायेनाचन्द्रार्क-क्षिति-समकालः पूर्व्वदत्त-भुक्त-भुज्यमान-देवब्रह्म-देयवर्जितो मया मातापित्रोरात्मनश्च पु-
४२ ण्य-यशोभिवृद्धये वेदार्थविदो यज्वनो भट्टविश्वरातस्य पौत्राय विद्यावदात-चेतसो भट्ट-श्रीवराहरातस्य पुत्राय। ४३ पदवाक्य-प्रमाण-विद्या-पारङ्गताय। औपमन्यव-सगोत्राय। आश्लायन सब्रह्मचारिणे भट्टप्रवर-वी[हे]करात मिश्राय ४४ शासनीकृत्य प्रतिपादितः[।] यतो भवद्भिः सर्व्वै रेव भूमे र्दानफल-गौरवादपहरणे महानरकपात-भयाच्च दानमि-
४५ दमनुमोद्य पालनीयम् प्रतिवासिभिः क्षेत्रकरै श्चाज्ञा-श्रवण-विधेयैर्भूत्वा समु[चि]त[करहिरण्य]ा-देयादि-सर्व्व-प्रत्यायोपन-

४६ यः कार्य्य इति[।] सम्बत् ३३ मार्ग-दिने २१। तथा च धर्म्मानुशासन-श्लोकाः।

सर्व्वानेतान् भाविनः पार्थिवेन्द्रान्
४७ भूयोभूयः प्रार्थयत्येष रामः।
सामान्योयं धर्म्मसेतु र्नृपाणां
काले काले पालनीयः क्रमेण॥
बहुभि र्वसुधा
४८ दत्ता राजभिः सगरादिभिः[।]
यस्य यस्य यदा भूमिः तस्य तस्य तदा फलं॥
स्वदत्ताम्परदत्ताम्वा यो हरेत वसु-
४९ न्धराम्[।]
स विष्ठायां कृमि र्भूत्वा पितृभिः सह पच्यते[॥]
इति कमलदलाम्बु-विन्दुलोलां
श्रियमनुचिन्त्य मनुष्य-
५० जीवितञ्च।
सकलमिदमुदाहृतञ्च बुद्ध्वा
न हि पुरुषैः परकीर्त्तयो विलोप्या[:]॥
श्रेयोविधावुभय[व]ंश-वि-
५१ शुद्धिभाजं
राजाकरोदधिगतात्मगुणं गुणज्ञः।
आत्मानुरूप-चरितं स्थिरयौवराज्यं
श्रीराज्यपाल मि-
५१ ह दूतक मात्मपुत्रं॥٭



বঙ্গানুবাদ।

ওঁ স্বস্তি॥

(১)

 যে সর্ব্বার্থভূমীশ্বর সুগত [বুদ্ধদেব] প্রবল [অধ্যাত্ম] শক্তিসমূহের আবির্ভাব-প্রভাবে ত্রিলোকনিবাসী[৪] প্রাণিবর্গের [সুপরিচিত] সিদ্ধিপথ অতিক্রম করিয়া [নির্বৃতি] নির্ব্বাণ-লোক লাভ করিয়াছিলেন, সেই পরপ্রয়োজন-সম্পাদন-স্থিরচেতা সৎপথ-প্রবর্ত্তক ভগবান্ সিদ্ধার্থদেবের সিদ্ধি প্রজাবর্গের সর্ব্বোত্তম সিদ্ধিবিধান করুক্।[৫]

(২)

 অনুপম সৌভাগ্যশালী গোপাল[দেব] লক্ষ্মীর সপত্নী পৃথিবী [দেবীর] পতি হইয়াছিলেন, বিনয়িবর্গের দৃষ্টান্তস্থল সেই রাজার শাসন-সময়ে পৃথু সগর প্রভৃতি [পুরাণ-প্রসিদ্ধ] নৃপতিবৃন্দ শ্রদ্ধেয় [বিশ্বাসযোগ্য ঐতিহাসিক ব্যক্তি] বলিয়া স্বীকৃত হইয়াছিলেন।[৬]

(৩)

 তিনি সমুদ্র পর্য্যন্ত ধরণীমণ্ডল জয় করিবার পর, আর [যুদ্ধোদ্যমের] প্রয়োজন নাই বলিয়া, মদমত্ত রণকুঞ্জরগণকে বন্ধন হইতে মুক্তিদান করিলে, তাহারা স্বাধীনভাবে বনগমন করিয়া, আনন্দাশ্রুপূর্ণ-লোচনে আনন্দাশ্রুপূর্ণলোচন বন্ধুগণকে পুনরায় দর্শন করিয়াছিল।

(৪)

 তাঁহার অসংখ্য সেনাদল [যুদ্ধার্থ] প্রচলিত হইলে, সেনাপদাঘাতোত্থিত ধূলিপটলে পরিব্যাপ্ত হইয়া, গগনমণ্ডল দীর্ঘকালের জন্য বিহঙ্গমগণের [বিচরণোপযোগী] পদ-প্রচারক্ষম [অবস্থাপ্রাপ্ত] হইত [বলিয়া প্রতিভাত হইত]।[৭]

(৫)

 যে রাজা শাস্ত্রার্থের অনুবর্ত্তী শাসনকৌশলে [শাস্ত্রশাসন হইতে] বিচলিত [ব্রাহ্মণাদি] বর্ণসমূহকে স্ব স্ব [শাস্ত্র-নির্দ্দিষ্ট] ধর্ম্মে প্রতিষ্ঠাপিত করিয়াছিলেন, ধর্ম্মপাল নামক সেই রাজাকে পুত্ররূপে লাভ করিয়া, গোপালদেব পরলোকগত পিতৃপুরুষগণের ঋণজাল হইতে মুক্তি লাভ করিয়াছিলেন।

(৬)

 তাঁহার রণকুঞ্জরগণ যখন গতিশীল পর্ব্বতমালার ন্যায় [যুদ্ধার্থ] প্রচলিত হইত, তখন তদ্দ্বারা আক্রান্ত হইয়া ধরণী যেন ধূলিরূপ ধারণ করিয়া, [আশ্রয় লাভের আশায়] নিরুপদ্রব আকাশমণ্ডলের শরণাপন্ন হইত।

(৭)

 দিগ্বিজয়-প্রবৃত্ত সেই নরপতির ভৃত্যবর্গ কেদার-তীর্থে[৮] যথাবিধি জলক্রিয়া [স্নান-তর্পনাদি] সম্পন্ন করিয়াছিলেন, এবং গঙ্গাসাগরসঙ্গমে তথা গোকর্ণ[৯] প্রভৃতি তীর্থেও ধম্ম্যকম্মের অনুষ্ঠান করিয়াছিলেন, এইরূপে এই রাজার দুষ্টদলন-শিষ্টপালন-বিষয়ক আনুসঙ্গিক সিদ্ধিও ভৃত্যবর্গের পারলৌকিক সিদ্ধিলাভের হেতুভূত হইয়াছিল।

(৮)

 সেই নরপতি দিগ্বিজয়-ব্যাপারের অবসানে, [তৎকাল-প্রসিদ্ধ] উৎকৃষ্ট পুরস্কার [বিতরণের] দ্বারা [পরাজিত] ভূপালবৃন্দের [পরাজয়-জনিত] চিত্তক্ষোভ বিদূরিত করিয়া, তাঁহাদিগকে স্ব স্ব ভবনে গমন করিবার জন্য অনুজ্ঞা-প্রচার করিলে, ভূপালবৃন্দ স্ব স্ব রাজ্য [পুনঃ] প্ৰাপ্ত হইয়া, যে সময়ে [রাজাধিরাজের] সমুচিত কার্য্যকলাপের চিন্তা করিতেন, তখন তাঁহাদের হৃদয়, পুণ্যক্ষয়ে স্বৰ্গনষ্ট জাতিস্মর মানবের হৃদয়ের ন্যায়, প্ৰীতিভরে উৎকণ্ঠিত হইয়া উঠিত।[১০]

(৯)

 গার্হস্থ্য-ধর্ম্মাবলম্বী সেই নরপাল রাষ্ট্ৰকূটরাজ্য-ভূষণ শ্রীপরবল নামক নরপালের কন্যা রণ্ণাদেবীর পাণিগ্রহণ করিয়াছিলেন।

(১০)

 সেই রাজ্ঞী স্বভাবগম্ভীর গুণরাশির আতিশয্যে অন্তঃপুরকে [অন্তঃপুরবাসি-মহিলাবৃন্দকে] পরাজিত করিয়াছিলেন। সেই পবিত্রাচারসম্পন্না রাজ্ঞী তাঁহার প্রজাবর্গের মনে বিতর্কের আবির্ভাব করাইয়াছিলেন বলিয়া তাহারা মনে করিত,—ইনি মূর্ত্তিমতী লক্ষ্মী, অথবা শরীরধারিণী পৃথিবী দেবী, অথবা [রাজার] মূর্ত্তিমতী কীর্ত্তি, অথবা রাজগৃহের অধিষ্ঠাত্রী দেবতা।

(১১)

 সমুদ্রের শুক্তি যেমন মুক্তারত্ন প্রসব কবিয়া থাকে, সেইরূপ প্ৰশংসনীয়া পতিব্রতা সেই রণ্ণাদেবীও প্রসন্নবদন দেবপালদেবকে প্রসব করিয়াছিলেন।

(১২)

 নির্ম্মলচেতা সংযতবাক্ পবিত্ৰ-কায়-কর্ম্ম-নিরত বোধিসত্ব যেমন নিরুপদ্রব বুদ্ধপদ লাভ করেন, নির্ম্মলচেতা সংযতবাক্ পবিত্ৰ-কায়-কর্ম্ম-নিরত দেবপালদেবও সেইরূপ নিরুপদ্রব পিতৃরাজ্য প্রাপ্ত হইয়াছিলেন।[১১]

(১৩)

 অপর [প্রতিকূলতাচরণপরায়ণ] নৃপতিবৃন্দের গর্ব্বখর্ব্বকারক সেই রাজার দিগ্বিজয়-প্রসঙ্গে রণকুঞ্জরগণ ভ্ৰমণ করিতে করিতে বিন্ধ্যগিরিতে[১২] উপনীত হইয়া, আনন্দাশ্রু-প্রবাহ-প্লাবিত বন্ধুগণকে পুনরায় দর্শন করিয়াছিল; এবং যুবক অশ্বগণও কাম্বোজ দেশে উপনীত হইয়া দীর্ঘকালের পর স্বকীয়-হৰ্ষসম্ভূত-হ্রেষারবমিশ্রিত-হ্রেষারবকারী প্রিয়তমাবৃন্দের দর্শন লাভ করিয়াছিল।

(১৪)

 সত্য যুগে যে দানপথ বলিরাজা কর্ত্তৃক আবিষ্কৃত হইয়াছিল, ত্ৰেতাযুগে যে দানপথে ভার্গব অগ্রসর হইয়াছিলেন, দ্বাপরে কর্ণ যাহার অনুসরণ করিতেন,[১৩] কালক্রমে বিক্রমাদিত্যের[১৪] তিরোভাবে যে দানপথ কলি-তাড়নে বিচ্ছিন্ন হইয়া পড়িয়াছিল, এই রাজা কর্ত্তৃক সেই [পুরাতন] দানপথ পুনরায় প্রকাশিত হইয়াছে।

(১৫)

 একদিকে হিমালয়, অপরদিকে শ্রীরামচন্দ্রের কীর্ত্তিচিহ্ন সেতুবন্ধ,—একদিকে বরুণ-নিকেতন অপরদিকে লক্ষ্মীর জন্মনিকেতন [ক্ষীরোদ-সমুদ্র,]—এই চতুঃসীমাবচ্ছিন্ন সমগ্র ভূমণ্ডল সেই রাজা নিঃসপত্নভাবে উপভোগ করিয়াছেন।

 

 

মূল পাঠের টীকা

^(১)  শার্দ্দূলবিক্রীড়িত। [উইকিসংকলন টীকা: বার্নেটের পাঠোদ্ধার অনুযায়ী কিল্‌হর্ণ-পঠিত সর্ব্বার্থ-ভূমীশ্বর-এর সঠিক পাঠ সংসর্ব্ব-ভূমীশ্বর। কিন্তু ১৯২১ সালে আবিষ্কৃত দেবপালের নালন্দা তাম্রশাসনে (এখানে দেখুন) সর্ব্বার্থ-ভূমীশ্বর পাঠই আছে এবং বার্নেটের মতে এখানেও তাই হওয়া উচিত ছিল।]

^(২)  প্রহর্ষিণী। এই শ্লোকের “सुविनयिनां” শব্দটি যথাযথভাবে পঠিত হইয়াছে কিনা, তৎসম্বন্ধে অধ্যাপক কিল্‌হর্ণ নিজেই সংশয় প্রকাশ করিয়া গিয়াছেন। লিথোগ্রাফে “सदिनतिनां” এইরূপ অক্ষর-বিন্যাস দেখিতে পাওয়া যায়। অধ্যাপক কিল্‌হর্ণ তাহাকে “सुविनयिनां” বলিয়া ধরিয়া লইয়াছেন। (উইকিসংকলন টীকা: তাম্রশাসনটির পুনরাবিষ্কারের পর ১৯২৫ সালে প্রকাশিত বার্নেটের পাঠোদ্ধার অনুযায়ী সঠিক পাঠ সতিকৃতিনাং)

^(৩)  বংশস্থবিল।

^(৪)  উপজাতি।

^(৫)  ইন্দ্রবজ্রা। লিথোগ্রাফে “अनुशास्ये” আছে; অধ্যাপক কিল্‌হর্ণ “अनुशास्य” পাঠ নির্দ্দেশ করিয়া গিয়াছেন।

^(৬)  ঔপচ্ছন্দসিক।

^(৭)  শার্দ্দূলবিক্রীড়িত।

^(৮)  শার্দ্দূলবিক্রীড়িত। “तै स्तै” স্থলে, লিথোগ্রাফে “तै तै” আছে।

^(৯)  আর্য্যা।

^(১০)  হরিণী।

^(১১)  আর্য্যা।

^(১২)  রথোদ্ধতা।

^(১৩)  শার্দ্দূলবিক্রীড়িত।

^(১৪)  শার্দ্দূলবিক্রীড়িত।

^(১৫)  রথোদ্ধতা। “निकेतनाच्च” পাঠ লিথোগ্রাফে নাই; অধ্যাপক কিল্‌হর্ণ তাহার সংশোধন করিয়া দিয়াছেন।

^٭১  ধর্ম্মপালদেবের খালিমপুরে আবিষ্কৃত তাম্রশাসনে “ভূপাল” শব্দের পর “অনন্ত” শব্দটি সংযুক্ত ছিল; এখানে তাহা পরিত্যক্ত হইয়াছে।

^٭২  এই শ্লোকে দেখিতে পাওয়া যায়,—“গুণজ্ঞ রাজা [শ্রীদেবপালদেব] মাতাপিতা উভয় বংশের বিশুদ্ধিভাক্ আত্মানুরূপ-গুণসম্পন্ন ও চরিত্রবান্ যৌবরাজ্যাভিষিক্ত আত্মপুত্র শ্রীরাজ্যপালকে [ইহ] এই তাম্রশাসনের দূতক নিযুক্ত করিয়াছিলেন।” কিন্তু দেবপালের দেহাবসানের পর, রাজ্যপাল নামধেয় কেহ সিংহাসনে আরোহণ করিয়াছিলেন বলিয়া প্রমাণ না পাইয়া, সুধীগণ স্থির করিয়াছেন,—পিতা বর্ত্তমান থাকিতেই, রাজ্যপাল পরলোক গমন করিয়া থাকিবেন। প্রকৃত পক্ষে, যুবরাজ রাজ্যপালই সিংহাসনে আরোহণ করিয়া, প্রথম বিগ্রহপাল নাম ধারণ করিয়াছিলেন বলিয়া অনুমান করা সহজ। [উইকিসংকলন টীকা: প্রথম বিগ্রহপাল ছিলেন ধর্মপালের ছোট ভাই বাক্‌পালের পৌত্র। তাঁর পুত্র নারায়ণপালের ভাগলপুর তাম্রশাসন থেকে পালবংশের এই শাখার বংশপরিচয় জানা যায়। দেবপালের পর তাঁর দুই ছেলে মহেন্দ্রপাল ও প্রথম শূরপাল পর পর সিংহাসনে বসেন। ১৯৮৭ সালে আবিষ্কৃত মহেন্দ্রপালের জগজ্জীবনপুর তাম্রশাসন (Epigraphia Indica Vol. LXII দ্রষ্টব্য) এবং ১৯৭০ সালে আবিষ্কৃত শূরপালের মির্জ়াপুর তাম্রশাসন (Epigraphia Indica Vol. LX দ্রষ্টব্য) থেকে এঁদের কথা জানা যায়।]

প্রশস্তি-পরিচয় ও অনুবাদ-অংশের টীকা

  1. Asiatic Researches, vol. I, pp. 123-130 and 142.
  2. Indian Antiquary, Vol. XXI, pp. 254-257.
  3. অধ্যাপক কিল্‌হর্ণ লিখিয়া গিয়াছেন,—The only passages about which I am at all doubtful and in which the re-discovery of the plate may prove me to have gone wrong, are the words Suvinayinám in line 5, Ráj-kuliya-samasta in line 40, and Kara-hiranya in line 45. For the rest, my text will, I trust, speak for itself—Indian Antiquary, Vol. XXI, p. 253. (উইকিসংকলন টীকা: তাম্রশাসনটি পরে পাওয়া যায় এবং ১৯২৫ সালে এর সঠিক পাঠ ছবিসহ প্রকাশিত হয়। এখানে দেখুন।)
  4.  বৌদ্ধমতে লোকত্রয়ের নাম কামধাতু, রূপধাতু ও অরূপধাতু,—তদূর্দ্ধে নির্ব্বাণ লোক। তজ্জন্য এই শ্লোকে ত্রৈলোক্য-শব্দের পরিবর্ত্তে “ত্রৈধাতুক” শব্দ ব্যবহৃত হইয়াছে। ডাক্তার ওয়াডেল তাঁহার সুবিখ্যাত গ্রন্থে [Buddhism of Tibet pp. 84-89] এই ত্রিলোক-তত্ত্ব ব্যাখ্যা করিবার জন্য লিখিয়া গিয়াছেন,—
     “The Buddhists divide every universe into three regions, in imitation, apparently, of the Brahmanic Bhavanatraya, substituting for the physical categories (Bhu earth, Bhuva heaven, and Svar space) of the Brahmans, ethical categories of Desire (Káma), Form (Rupa), and Form-lessness (Arupa) which collectively are known as the “Three Regions”. এই ত্রিলোক “ত্রিধাতু”-নামে কথিত। তন্মধ্যে কামলোক [কামধাতু] সর্ব্বনিম্নে অধিষ্ঠিত; এবং পৃথিবী ও ছয়টি দেবলোক তাহার অন্তর্গত। ইহার উপরে ব্রহ্মলোক, তাহার নাম “রূপধাতু”, তাহা চারিটি ধ্যান-লোকে বিভক্ত, এবং তাহাই ষোড়শ ব্রহ্ম লোক নামে কথিত। নির্ব্বাণ-লোকের নিম্নে এবং পূর্ব্বোক্ত লোকদ্বয়ের ঊর্দ্ধে “অরূপধাতু” নামক চারিটি সর্ব্বোচ্চ ব্রহ্ম-লোক। প্রবল অধ্যাত্মশক্তি সমূহের আবির্ভাব-প্রভাবে শাক্যসিংহ এই ব্রহ্মলোকের ঊর্দ্ধে অবস্থিত নির্ব্বাণ-লোক অধিকার করিয়াছিলেন।
  5.  অধ্যাপক কিল্‌হর্ণ এই শ্লোকের দুইটি অর্থের সন্ধান করিয়া, রাজার পক্ষেও একটি অর্থ প্রকটিত করিবার অভিপ্রায়ে লিখিয়া গিয়াছেন,—Like the verses at the commencement of the Dinájpur, Bhágulpur and Ámgáchi plates, this verse is applicable both to the founder of the Buddhist religion (Sidhártha, Sugata, Sarvárthasiddha) and the king, in this case Devapáladeva, who issued this grant. এই শ্লোকটি সুকৌশলে রচিত ও ধ্বন্যাত্মক। ইহাতে বৌদ্ধমতের প্রাধান্য কীর্ত্তিত হইয়াছে।
  6.  পৃথু সগর প্রভৃতি পুরাণ-প্রসিদ্ধ নরপালগণের যে সকল অলৌকিক গুণাবলী চিরপরিচিত, তাহা কাল্পনিক বলিয়া মনে হইত। গোপালদেবকে দেখিয়া লোকের সংশয় বিদূরিত হইয়াছিল, পৃথু, সগরাদিও যে সত্য সত্যই তদ্রূপ গুণশালী ছিলেন, গোপালদেবের গুণাবলী লক্ষ্য করিয়া, লোকে তাহাতে শ্রদ্ধাবান্ হইয়াছিল। সমসাময়িক প্রকৃতিপুঞ্জ “মাৎস্য ন্যায়” বিদূরিত করিবার আশায়, কিরূপ ব্যক্তিকে রাজা নির্ব্বাচিত করিয়াছিল, এই বর্ণনায় তাহার আভাস প্রাপ্ত হওয়া যায়।
  7.  নিরন্তর যুদ্ধযাত্রায় নিরন্তর ধূলিপটল ঊর্দ্ধদিকে উত্থিত হইত বলিয়া, ভূপতিত হইবার অবসর না পাইয়া, এমন জমাট বাঁধিয়া থাকিত যে তাহার উপর পক্ষিগণ পদভরে বিচরণ করিয়া বেড়াইতে পারিত।
  8.  হিমালয়ের মধ্যবর্ত্তী কেদার-তীর্থ ভিন্ন, এই নামের আর কোনও তীর্থের পরিচয় প্রাপ্ত হওয়া যায় না বলিয়া, এতদ্বারা দিগ্বিজয়ের উত্তরসীমা সূচিত হইয়াছে।
  9.  গোকর্ণ বোম্বে প্রেসিডেন্সির অন্তর্গত। অধ্যাপক কিল্‌হর্ণ তদ্দেশে দীর্ঘকাল বাস করিয়া লিখিয়া গিয়াছেন,—It is even now a place of pilgrimage frequented by Hindu devotees from all parts of India, এতদ্বারা দিগ্বিজয়ের পশ্চিমসীমা সূচিত হইয়াছে।
  10.  এই শ্লোকে রাজকবি কৌশলক্রমে ধর্ম্মপালের রাজনীতি কিরূপ ছিল, তাহারই পরিচয় প্ৰদান করিয়া গিয়াছেন।
  11.  ধর্ম্মপালের সুদীর্ঘ শাসনকালে তাঁহার বিপুল সাম্ৰাজ্য সকল সময়ে সম্যক্ নিরুপদ্রব ছিল বলিয়া প্রমাণ প্রাপ্ত হওয়া যায় না। এই শ্লোকের বর্ণনা পাঠ করিলে মনে হয়, তাঁহার দেহাবসান-সময়ে রাজ্যমধ্যে কোনরূপ উপদ্রব বর্ত্তমান ছিল না। সিংহাসনে আরোহণ করিবার পর, দেবপালদেবকেও অনেক যুদ্ধ কলহে লিপ্ত হইতে হইয়াছিল। তাহার কথা এই তাম্রশাসনে এবং ভট্টগুরবের গরুড়স্তম্ভ-লিপিতে উল্লিখিত আছে। সুতরাং এই শ্লোকে কেবল সিংহাসনারোহণকালের কথাই বিবৃত হইয়াছে বলিয়া বুঝিতে হইবে।
  12.  বিন্ধ্যগিরি এক সময়ে গজেন্দ্রগণের বিহার-ক্ষেত্র বলিয়া পরিচিত ছিল। চাঁদকবির “পৃথ্বীরাজ রাসো” গ্রন্থে তাহার পরিচয় প্রাপ্ত হওয়া যায়। “ঐতিহাসিক চিত্রের” প্রথম পর্য্যায়ের প্রথম বর্ষের পত্রিকার ১৩১ পৃষ্ঠায় অনুবাদ সহ এতদ্বিষয়ক চাঁদকবির শ্লোকগুলি দ্রষ্টব্য।
  13.  পৌরাণিক আখ্যানগুলি সূচিত হইয়াছে। ভার্গবের [পরশুরামের] দানশীলতার উল্লেখ করিতে গিয়া, মহাকবি ভবভূতি “মহাবীর চরিতে” [দ্বিতীয় অঙ্কে] তাহাকে অলৌকিক বলিয়াই লিখিয়া গিয়াছেন,—

    “उत्‌पत्ति र्जमदग्नितः स भगवान् देवः पिनाकी गुरुः
    वीर्य्यं यत्तु न तद्गिरां पथि नु तद्व्यक्तं हि तत् कर्म्मभिः।
    त्यागः सप्त-सप्त-समुद्र-मुद्रित-मही-निर्व्याज-दानावधिः
    सत्यब्रह्म तपोनिधे र्भगवतः किं वा न लोकान्तरम्॥”

  14.  মূল শ্লোকে বিক্রমাদিত্যের নাম নাই,—“শকদ্বিষি” বলিয়া পরিচয় আছে।