গৌড়লেখমালা (প্রথম স্তবক)/নারায়ণপালদেবের তাম্রশাসন


 

নারায়ণপালদেবের তাম্রশাসন।

[ভাগলপুর-লিপি]
প্ৰশস্তি-পরিচয়।

 এই তাম্রশাসনখানি ভাগলপুরে আবিষ্কৃত হইয়াছিল বলিয়া, “ভাগলপুর-লিপি” নামে সুপরিচিত। ইহা নারায়ণপালদেবের তাম্রশাসন। এই শাসনখানি এক্ষণে কলিকাতা-নগরে আবিষ্কার-কাহিনী। এসিয়াটিক্ সোসাইটির পুস্তকাগারে রক্ষিত হইতেছে। ইহা কিরূপে ভাগলপুরে আসিয়াছিল, তাহা বিস্মৃতিগর্ভে বিলীন হইয়া গিয়াছে। আবিষ্কৃত হইবার পর, পাঠোদ্ধারের জন্য, এই শাসনলিপি ডাক্তার রাজেন্দ্রলালের হস্তে ন্যস্ত হইয়াছিল।

 ডাক্তার রাজেন্দ্রলাল যেরূপ পাঠোদ্ধারে কৃতকার্য্য হইয়াছিলেন, তাহা তাঁহার একখানি গ্রন্থে[১] এবং সোসাইটির পত্রিকায়[২] মুদ্রিত হইয়াছিল। তাহাতে ভ্রমপ্রমাদের অভাব ছিল না; পাঠোদ্ধার-কাহিনী। অনেকস্থলে অনেক মনঃকল্পিত পাঠও মুদ্রিত এবং ব্যাখ্যাত হইয়াছিল। উত্তরকালে ভিয়েনা-নিবাসী ডাক্তার হুল্‌জ্, তাম্রপট্ট হইতে প্রতিলিপি গ্রহণ করিয়া, এই শাসন-লিপির পাঠোদ্ধারে ব্যাপৃত হইয়াছিলেন। তাঁহার উদ্ধৃত পাঠই[৩] এক্ষণে এই তাম্রশাসনের মূলানুগত পাঠ বলিয়া সুপরিচিত।

 পাঠোদ্ধারের পর ব্যাখ্যাকার্য্যে হস্তক্ষেপ করিয়া, ডাক্তার রাজেন্দ্রলাল এই শাসন-লিপির প্রকৃত ব্যাখ্যা উদ্ঘাটিত করিতে পারেন নাই। তাঁহার ব্যাখ্যা যে কি জন্য মূলানুগত হইতে ব্যাখ্যা-কাহিনী। পারে নাই, তাহা “ঐতিহাসিক চিত্রে”[৪] প্রকাশিত হইয়াছিল। ডাক্তার হুল্‌জের ব্যাখ্যাও সকল স্থলে মূলানুগত হইয়াছে বলিয়া স্বীকার করিতে সাহস হয় না। কারণ, তিনিও অনেক কষ্টকল্পনার অবতারণা করিয়া গিয়াছেন।[৫]

 এই তাম্রশাসন খানির প্ৰথম পৃষ্ঠে ২৯ পংক্তি এবং দ্বিতীয় পৃষ্ঠে ২৫ পংক্তি [সংস্কৃতভাষা-নিবদ্ধ] পদ্যগদ্যাত্মক লিপি এবং রাজমুদ্রায় “শ্রীনারায়ণপালদেব” এই কয়টি অক্ষর উৎকীর্ণ রহিয়াছে। লিপি-পরিচয়। মঙ্গলাচরণ হইতে আরম্ভ করিয়া, বংশবিবৃতিমূলক বিবরণ বিজ্ঞাপিত করিবার জন্য, রাজকবি যে সকল শ্লোক রচনা করিয়াছিলেন, তাহার কোন কোন শ্লোক পরবর্ত্তী পাল-নরপালগনের তাম্রশাসনে উদ্ধৃত হইয়া আসিয়াছে। ইহার দূতক [ভট্ট গুরব] একজন অসাধারণ পণ্ডিত বলিয়া [৫২-৫৩ পংক্তিতে] উল্লিখিত।

 তীরভুক্তির অন্তর্গত [২৯ পংক্তি] কক্ষ নামক বিষয়ান্তর্গত মকুতিকা গ্ৰাম [৩০ পংক্তি] শ্রীমুদ্গগিরি-সমাবাসিত শ্রীমজ্জয়স্কন্ধাবার হইতে [২৮ পংক্তি] পরম সৌগত মহারাজাধিরাজ লিপি-বিবরণ। শ্রীবিগ্রহপালদেবের পাদানুধ্যানপরায়ণ পরমেশ্বর পরম ভট্টারক মহারাজাধিরাজ শ্রীমন্নারায়ণপালদেব কর্ত্তৃক [২৮-২৯ পংক্তি] তদীয় বিজয়রাজ্যের সপ্তদশ বর্ষের “৯ বৈশাখ দিনে” [৪৭ পংক্তি] “কলসপোত” নামক স্থানে প্ৰতিষ্ঠিত শিবমন্দিরের এবং পাশুপতাচার্য্য-পরিষদের [৩৯ পংক্তি] ব্যবহারার্থ প্রদত্ত হইবার কথা এই তাম্রশাসনে উল্লিখিত আছে। ইহা “সৎসমতট-জন্মা শুভদাস-পুত্র শ্রীমান্ মংখদাস” নামক শিল্পিকর্ত্তৃক [৫০-৫৪ পংক্তি] উৎকীৰ্ণ হইয়াছিল।

 

 

প্রশস্তি-পাঠ।

 ॐ स्वस्ति॥
मैत्रीं कारुण्यरत्न-प्रमुदितहृदयः
प्रेयसीं सन्दधानः
सम्यक्-सम्बोधिविद्या-सरिदम-
लजल क्षालिताज्ञानपङ्कः।
जित्वा यः काम-
कारि प्रभव मभिभवं शाश्वतीं प्राप शान्तिं
स श्रीमान् लोकनाथो जय-
ति दशबलोऽन्यश्च गोपालदेवः॥(১)


लक्ष्मी-जन्मनिकेतनं समकरो वोढ़ुं क्षमः क्ष्मा-भरं
पक्षच्छेदभयादु-
पस्थितवता मेकाश्रयो भूभृतां।
मर्य्यादा-परिपालनैकनिरतः शौर्य्यालयो ऽस्मादभू-
द्दुग्धाम्भोधि-विलास-
हासि-महिमा श्रीधर्म्मपालो नृपः॥(২)
जित्वेन्ट्रराज‑प्रभृती‑नराती-
नुपार्जिता येन महोदय-श्रीः।
दत्ता पुनः
सा बलिनार्थयित्रे
चक्रायुधायानति-वामनाय॥(৩)
रामस्येव गृहीत-सत्यतपस स्तस्यानुरूपो गुणैः
सौमित्रे रुदपा-
दि तुल्य-महिमा वाक्‌पालनामानुजः।
यः श्रीमान्नय-विक्रमैक-वसति र्भ्रातुः स्थितः शासने
शून्याः शत्रु-पताकिनी-
१० भि रकरो देकातपत्रा दिशः॥(৪)
तस्मादुपेन्द्रचरितै र्ज्जगतीं पुनानः
पुत्रो बभूव विजयी जयपालनामा।
धर्म्मद्वि-
११ षां शमयिता युधि देवपाले
यः पूर्व्वजे भुवनराज्य-सुखान्यनैषीत्॥(৫)

यस्मिन् भ्रातु र्न्निदेशाद्बलवति परितः प्रस्थिते
१२ जेतु माशाः
सीदन्नाम्नैव दूरान्निजपुर मजहादुत्कलानामधीशः।
आसाञ्चक्रे चिराय प्रणयि-परिवृतो बिभ्रदु-
१३ च्चेन मूर्द्ध्ना
राजा प्राग्‌ज्योतिषाणा मुपशमित-समित्-संकथां यस्य चाज्ञां॥(৬)
श्रीमान् विग्रहपाल स्तत्सूनु रजातशत्रु रि-
१४ व जातः।
शत्रुवनिता-प्रसाधन-विलोपि-विमलासि-जलधारः॥(৭)
रिपवो येन गुर्व्वीणां विपदा मास्पदीकृताः।
पुरुषायु-
१५ ष-दीर्घाणां सुहृदः सम्पदामपि॥(৮)
लज्जेति तस्य जलधे रिव जह्नु-कन्या
पत्नी बभूव कृत-हैहय-वंशभूषा।
यस्याः शुची-
१६ नि चरितानि पितुश्व वंशे
पत्युश्च पावन-विधिः परमो बभूव॥(৯)
दिक्‌पालैः क्षितिपालनाय दधतं देहे विभक्ताः
१७ श्रियः
श्रीनारायणपालदेव मसृजत्तस्यां स पुण्योत्तरं।
यः क्षोणीपतिभिः शिरोमणिरुचा-श्लिष्टाङ्घ्रि-पीठोपलं
न्यायोपा-
१८ त्त मलञ्चकार चरितैः स्वैरेव धर्म्मासनं॥(১০)


चेतः पुराण‑लेख्यानि चतुर्व्वर्ग्ग-निधीनि च।
आरिप्सन्ते यतस्त्यानि चरितानि महीभृतः॥(১১)
१९ स्वीकृत-सुजन-मनोभिः सत्यापित-सातिवाहनः सूक्तैः।
त्यागेन यो व्यधत्त श्रद्धेया मङ्गराज-कथां॥(১২)
भयादरातिभि र्यस्य रण-
२० मूर्द्धनि विस्फुरम्।
असिरिन्दीवर-श्यामो ददृशे पीत-लोहितः॥(১৩)
यः प्रज्ञया च धनुषा च जगद्विनीय
नित्यं न्यवीविशद-
२१ नाकुल मात्म-धर्म्मे।
यस्यार्थिनो सविध मेत्य भृशं कृतार्थाः
नैवार्थितां प्रति पुन र्व्विदधु र्म्मनीषां॥(১৪)
श्रीपति रकृष्ण-कर्म्मा विद्या-
२२ धरनायको महाभोगी।
अनल-सदृशोपि धाम्ना य श्वित्रन्नलसम श्चरितैः॥(১৫)
व्याप्ते यस्य त्रिजगति शरच्चन्द्र गौरै र्यशो-
२३ भि-
र्म्मन्ये शोभान्न खलु विभरामास रुद्रादृहासः।
सिद्धस्त्रीणा मपि शिरसिजेष्वर्प्पिताः केतकीनां
पत्रापीड़ाः सुचिर म-
२४ भवन् भृङ्ग-श्ब्दानुमेयाः॥(১৬)


तपो ममास्तु राज्यं ते द्वाभ्यामुक्तमिदं द्वयोः।
यस्मिन् विग्रहपालेन सगरेण भगीरथे॥(১৭)

स खलु भा-
२५  गीरथीपथ-प्रवर्त्तमान-नानाविध-नौवाट-सम्पादित-सेतुबन्धनिहित-शैलशिखरश्रेणी-विभ्रमात्, निरतिशय-घन-घनाघन-घटा
२६ श्यामायमान-वासरलक्षी-समारब्ध-सन्तत-जलदसमय-सन्देहात्, उदीचीनानेकनरपति-प्राभृतीकृता-प्रमेय-हयवाहिनी-खर-
२७ खुरोत्खात-धूलीधूसरित-दिगन्तरालात्, परमेश्खर-सेवा-समायाताशेष जम्बूद्दीप-भूपालानन्त-पादात-भरनमदवनेः। श्रीमु-
२८ द्गगिरि-समावासित-श्रीमज्जयस्कन्धावारात्, परमसौगतो महाराजाधिराज-श्रीविग्रहपालदेव-पादानुध्यातः परमेश्वरः पर-
२९ मभट्टारको महाराजाधिराजः श्रीमन्नारायणपालदेवः कुशली। तीरभुक्तौ। कक्षवैषयिक-स्वसम्बद्धाविच्छुिन्न-तलो-
३० पेत-मकुतिका-ग्रामे। समुपगताशेष-राजपुरुषान्। राज-
३१ राजनक। राजपुत्र। राजामात्य। महासान्धिविग्रहिक। महाक्षपटलिक। म-
३२ हासामन्त्त। महासेनापति। महाप्रतीहार। महाकार्त्ताकृतिक। महा- ३३ दौः-साधसाधनिक। महादण्डनायक। महाकुमारामात्य। राजस्थानीयोपरिक। दाशापराधिक। चौरोद्धरणिक।
३४ दाण्डिक। दाण्डपाशिक। शौल्किक। गौल्मिक। क्षेत्रप। प्रान्तपाल। कोट्टपाल। खण्डरक्ष। तदायुक्तक। विनियुक्तक। हस्त्य-
३५ श्वोष्ट्र-नौबल-व्यापृतक। किशोर। वड़वा। गोमहिषाजाविकाध्यक्ष। दूतप्रेषणिक। गमागमिक। अभित्व[र]माण। विषयपति
३६ ग्रामपति। तरिक। गौड़। मालव। खश। हूण। कुलिक। कर्णाट। ला[ट]। चाट। भट। सेवकादीन्। अन्यांश्चार्कीर्त्तितान्।
३७ राजपादोपजीविनः प्रतिवासिनो ब्राह्मणोत्तरान्। महत्तमोत्तम-पुरोगमेदान्ध(न्ध्र)चण्डाल-पर्य्यन्तान्। यथार्हं मानयति।
३८ बोधयति। समादिशति च। मतमस्तु भवतां। कलशपोते। महाराजाधिराज-श्रीनारायणपालदेवेन स्वयं-कारित-सहस्रा-
३९ यतनस्य। तत्र प्रतिष्ठापितस्य। भगवतः शिवभट्टारकस्य। पाशुपत आचार्य्यपरिषद श्व। यथार्हं पूजा-बलि-चरु-सत्र-नव-क-
४० र्म्माद्यर्थं। शयनासन-ग्लान-प्रत्यय-भैषज्य-परिष्काराद्यर्थं। अन्येषामपि स्वाभिमतानां। स्वपरिकल्पित-विभागेन। अनवद्य-भो-
४१ गार्थञ्च। यथोपरिलिखित-मकुतिकाग्रामः। स्वसीमा-तृणयूति-गोचर-पर्य्यन्तः। सतलः। सोद्देशः। साम्रमधूकः। सजल-
४२ स्थलः। सगर्त्तोषरः। सोपरिकरः। सदशापचारः। सचौरोद्धरणः। परिहृत-सर्व्वपीड़ः। अचाटभट-प्रवेशः। अकिञ्चि-
४३ त्-प्रग्राह्यः। समस्त-भाग-भोग-कर-हिरण्यादि-प्रत्याय-समेतः। भूमिच्छिद्रन्यायेनाचन्द्रार्क्क-क्षिति समकालं यावत् माता-पि-
४४ त्रो रात्मनश्च पुण्ययशोऽभिवृद्धये। भगवन्तं शिवभट्टारकमुद्दिश्य शासनीकृत्य प्रदत्तः। ततो भवद्भिः सर्व्वैरेवानु-
४५ मन्तव्यं भाविभिरपि भूपतिभि र्भूमे र्द्दानफल-गौरवादप-हरणे च महानरकपात-भयाद्दानमिदमनुमोद्य पालनीयं प्र- ४६ तिवासिभिः क्षेत्रकरै श्चाज्ञा-श्रवण-विधेयीभूय यथाकालं समुचित-भाग-भोग-कर-हिरण्यादि-सर्व्वप्रत्यायोपनयः का-
४७ र्य्य इति। सम्वत् १७ वैशाखदिने ९ [॥] तथा च धर्म्मानुशङ्सिनः श्लोकाः।

बहुभि र्व्वसुधा दत्ता राजभिः सगरादिभिः [।]
४८ यस्य यस्य यदा भूमि स्तस्य तस्य तदा फलं॥

षष्टिं वर्षसहस्राणि स्वर्ग्गे मोदति भूमिदः।
आक्षेप्ता चानुमन्ता च तान्येव न-
४९ रके वसेत्॥
स्वदत्ता म्परदत्ताम्वा यो हरेत वसुन्धरां।
स विष्ठायां कृमि र्भूत्वा पितृभिः सह पच्यते॥
सर्व्वानेतान् भाविनः
५० पार्थिवेन्द्रान्
भूयोभूयः प्रार्थयत्येष रामः।
सामान्योऽयन्धर्म्म-सेतु र्नृपाणां
काले काले पालनीयः क्रमेण॥
इति क-
५१ मलदलाम्बु-विन्दुलोलां
श्रिय मनुचिन्त्य मनुष्य-जीवितञ्च।
सकलमिदमुदाहृतञ्च बुद्ध्वा
नहि पुरुषैः परकीर्त्तयो विलो-
५२ प्याः॥
वेदान्तै रप्यसुगमतमं वेदिता ब्रह्मत(ता)र्थं
यः सर्व्वासु श्रुतिषु परमः सार्द्ध मङ्गै रधीती।
यो यज्ञानां समुदित-महाद-
५३ क्षिणानां प्रणेता
भट्टः श्रीमानिह स गुरवो दूतकः पुण्यकीर्त्तिः॥(১৮)
श्रीमता मङ्घदासेन शू(शु)भदासस्य शू(सू)नुना।
इदं सा (शा)-
५४ श(स)न मुत्‌कीर्ण्णं सत्-समतट-जन्मना॥(১৯)

 

 
 

বঙ্গানুবাদ।

(১)

 যিনি কারুণ্যরত্ন-প্রমুদিতহৃদয়ে[৬] মৈত্রীকে প্ৰিয়তমারূপে ধারণ করিয়াছিলেন, যিনি তত্ত্বজ্ঞান-তরঙ্গিণীর সুবিমল সলিলধারায় অজ্ঞান-পঙ্ক প্রক্ষালিত করিয়াছিলেন, যিনি কামক [কামদেব] অরির [পরাক্রম-সঞ্জাত] আক্রমণ পরাভূত করিয়া, শাশ্বতী শান্তি লাভ করিয়াছিলেন; সেই শ্রীমান্‌ দশবল লোকনাথের[৭] জয় হউক।

এবং[৮]

 যিনি করুণারত্নোদ্ভাসিতবক্ষে [প্ৰজাবর্গের] মিত্রতা[৯] ধারণ করিয়া, সম্যক্-সম্বোধ-প্রদায়িনী জ্ঞানতরঙ্গিণীর[১০] সুবিমল সলিল-ধারায় [লোক-সমাজের] অজ্ঞান-পঙ্ক প্রক্ষালিত করিয়া, [দুর্ব্বলের প্রতি অত্যাচারপরায়ণ স্বেচ্ছাচারী] কাম-কারিগণের[১১] [পরাক্রম-সঞ্জাত মাৎস্য-ন্যায়ের] আক্রমণ পরাভূত করিয়া, [রাজ্য মধ্যে] চিরশান্তি[১২] সংস্থাপিত করিয়াছিলেন, সেই শ্রীমান্ গোপালদেব নামক অপর [রাজাধিরাজ] লোকনাথেরও জয় হউক।

(২)

 এই গোপালদেব হইতে শ্রীধর্ম্মপাল নরপতি জন্মগ্রহণ করিয়াছিলেন। তাঁহার মহিমা [দুগ্ধাম্ভোধি-বিলাস] ক্ষীরোদসমুদ্র-সৌন্দর্য্যকে উপহাস করিত। লক্ষ্মীর উদ্ভবস্থান বলিয়া ক্ষীরোদসমুদ্র “লক্ষ্মীজন্ম-নিকেতন”, তিনিও রাজকুলে সমুদ্ভূত বলিয়া “লক্ষ্মী-জন্মনিকেতন;”—ক্ষীরোদসমু্দ্র মকরপূর্ণ বলিয়া “স-মকর”; তিনিও সমভাবে রাজকর গ্রহণ করিতেন বলিয়া “সম-কর”;—ক্ষীরোদসমুদ্র বিষ্ণুকে বহন করিতে সমর্থ বলিয়া “ক্ষ্মাভর-বহন-ক্ষম”, তিনিও ধরাভারবহনে সমর্থ বলিয়া “ক্ষ্মা-ভরবহনক্ষম”;—পক্ষচ্ছেদভয়ে শরণাগত [ভূভৃৎ] ধরাধারক পর্ব্বতসমূহের পক্ষে ক্ষীরোদসমুদ্র একমাত্র আশ্রয়, স্বপক্ষচ্ছেদভয়ে শরণাগত [ভূভৃৎ] নরপালগণের পক্ষে তিনিও একমাত্র আশ্রয়;—ক্ষীরোদসমুদ্র জলস্থলের [মর্য্যাদা] সীমা সংরক্ষণে নিরত, তিনিও লোকসমাজের [মর্য্যাদা] শাস্ত্রনির্দ্দিষ্ট-স্বধর্ম্ম-সংরক্ষণে একনিষ্ঠ;—[সন্ধ্যাসমাগমে সূর্য্যতেজঃ সমুদ্রগর্ভে অস্তমিত হয় বলিয়া] ক্ষীরোদসমুদ্র [শৌর্য্যালয়] সূর্য্যকিরণের আধার, তিনিও বীরত্বের আধার [শৌর্য্যালয়]।[১৩]

(৩)

 সেই বলবান্ রাজা ইন্দ্ররাজ প্ৰভৃতি শত্রুবর্গকে জয় করিয়া, [মহোদয়-শ্রী] কান্যকুব্জের রাজশ্রী লাভ করিয়াছিলেন; এবং [পুরাণ-প্রসিদ্ধ] বলিরাজা যেমন [পুরাকালে] ইন্দ্রাদি শত্রুগণকে জয় করিয়া, মহোদয়শ্রী লাভ করিয়াও, যাচকরূপী [চক্রায়ুধ] বামনাবতারকে তৎসমস্ত পুনরায় দান করিয়াছিলেন, এই বলবান্[১৪] রাজাও সেইরূপ প্রণতি-পরায়ণ [বামনরূপে চরণাবনত] চক্রায়ুধ নামক সামন্ত-নরপালকে কান্যকুব্জের রাজশ্রী প্রদান করিয়াছিলেন।[১৫]

(৪)

 সত্যব্রত-পালন-পরায়ণ শ্রীরামচন্দ্রের অনুজ সৌমিত্রীর তুল্য মহিম-সমন্বিত বাক্‌পাল নামে [এই রাজার] এক অনুজ ভ্রাতা জন্মগ্রহণ করিয়াছিলেন। তিনি নীতি এবং বিক্রমের নিবাসস্থল ছিলেন; এবং জ্যেষ্ঠ-ভ্রাতার শাসনে অবস্থিত থাকিয়া, একচ্ছত্র-শাসন-সংস্থিত দশদিক্‌ শত্ৰু-পতাকিনী-শূন্য করিয়া দিয়াছিলেন।[১৬]

(৫)

 সেই [ধর্ম্মপাল[১৭]] হইতে বিজয়ী জয়পাল নামক পুত্র জন্মগ্রহণ করিয়াছিলেন। তিনি ইন্দ্রের কনিষ্ঠ-ভ্রাতা বিষ্ণুর[১৮] [উপেন্দ্রের] চরিত্রের ন্যায় পবিত্র-চরিত্র-মাহাত্ম্যে পৃথিবীর পবিত্রতা সম্পাদন পূর্ব্বক, ধর্ম্মদ্বেষিগণকে[১৯] যুদ্ধে বশীভূত করিয়া, দেবপাল নামক [পূর্ব্বজ] জ্যেষ্ঠ সহোদরকে ভুবন-রাজ্যসুখের অধিকারী করিয়া দিয়াছিলেন।

(৬)

 জ্যেষ্ঠ-ভ্রাতার [দেবপালদেবের] নির্দ্দেশক্রমে সেই বলবান্ [জয়পাল] দিগ্বিজয়ার্থ চতুর্দ্দিকে প্রধাবিত হইলে, দূর হইতে [তাঁহার] নামমাত্র শ্রবণ করিয়াই, উৎকলাধীশ অবসন্ন হইয়া, [স্বকীয়] রাজধানী পরিত্যাগ করিয়াছিলেন। প্ৰাগ্‌জ্যোতিষের অধীশ্বরও[২০] তদীয় উচ্চ মস্তকে [জয়পালের] যুদ্ধোদ্যমোপশম-কারিণী[২১] আজ্ঞা ধারণ করিয়া, আত্মীয়বর্গ-পরিবেষ্টিত হইয়া, চিরকাল [পরমসুখে] অবস্থিতি করিয়াছিলেন।

(৭)

 তাঁহার[২২] অজাতশত্রুর[২৩] ন্যায় শ্রীমান্ বিগ্রহপাল নামক পুত্র জন্মগ্রহণ করিয়াছিলেন। তাঁহার [বিমল জলধারার ন্যায়] বিমল অসিধারায় শত্রু-বনিতা বর্গের [সধবা-জনোচিত] অঙ্গরাগ বিলুপ্ত হইয়া গিয়াছিল।

(৮)

 তিনি শত্রুবর্গকে গুরুতর বিপদ্-ভোগের পাত্র এবং সুহৃদ্বর্গকে যাবজ্জীবন[২৪] সম্পৎ-সম্ভোগের পাত্র করিয়াছিলেন।

(৯)

 সমুদ্রপত্নী [জহ্নুকন্যা] জাহ্নবীর ন্যায় হৈহয় [রাজ]-বংশ-ভূষণরূপা[২৫] লজ্জা নাম্নী [কন্যা] তাঁহার পত্নী হইয়াছিলেন। [সেই লজ্জাদেবীর] বিশুদ্ধ চরিত্র তদীয় পিতৃবংশে এবং পতি-বংশে পরম “পাবন-বিধি” বলিয়া পরিগণিত হইয়াছিল।

(১০)

 যিনি পৃথিবী-পালনার্থ দিক্‌পালগণকর্ত্তৃক[২৬] বিভক্ত-শ্রী [গুণসমূহ][২৭] আত্ম-শরীরে ধারণ করিতেছেন, সেই পুণ্যোত্তর শ্রীমান্‌ নারায়ণপাল নামক পুত্রকে বিগ্রহপালদেব লজ্জাদেবীর গর্ভে জন্মদান করিয়াছিলেন। সেই পুত্র সমস্ত-সামন্ত-শিরোমণি-জ্যোতিঃ-সংস্পর্শ-সুশোভিত-পাদপীঠসংযুক্ত ন্যায়ার্জ্জিত[২৮] রাজসিংহাসন আত্মচরিত্ৰ-[জ্যোতিঃ]-সংস্পর্শে অলংকৃত করিতেছেন।

(১১)

 চিত্তক্ষেত্রে পুরাণ-বৰ্ণিত পবিত্র বৃত্তান্তের ন্যায় প্ৰতীয়মান[২৯] নারায়ণপালদেবের [ধর্ম্মার্থকামমোক্ষরূপ] চতুর্ব্বর্গ-নিধানভূত পবিত্র চরিত্রের অনুকরণ করিতে আরম্ভ করিবার জন্য সকল মহীপালই ইচ্ছা করিয়া থাকেন।

(১২)

 সজ্জন-মনোমোদিনী সু-উক্তি দ্বারা তিনি সাতিবাহন[৩০] রাজাকে [সত্যাপিত] অকাল্পনিক সত্যপুরুষ বলিয়া, এবং দানশীলতায় [কর্ণ নামক] অঙ্গাধিপতির [দানশীলতার] কাহিনী বিশ্বাসযোগ্য বলিয়া প্রতিপাদন করিয়া দিয়াছেন।

(১৩)

 তাঁহার ইন্দীবৱশ্যাম অসি-পত্ৰ, রণস্থলে বিস্ফুরিত হইবার সময়ে, তাহাকে শত্রুগণ [ভয়াতিশয্যে] পীতলোহিত-বর্ণ-বিশিষ্ট বলিয়া দর্শন করিত।

(১৪)

 তিনি প্ৰজ্ঞাবলে এবং বাহুবলে জগদ্বাসিগণকে বিনীত করিয়া, নিয়ত অবিচলিতভাবে আত্মধর্ম্মে অভিনিবিষ্ট হইয়া রহিয়াছেন;—তাঁহার নিকট অর্থিজন সমাগত হইলে, অত্যন্ত কৃতার্থ হইয়া যায়; আর কখনও কাহারও নিকট কিছু প্রার্থনা করিবার ইচ্ছা পোষণ করিতে পারে না।

(১৫)

 তাঁহার চরিত্রে বিচিত্র [বিরুদ্ধ] গুণ-সমাবেশ[৩১] দেখিতে পাওয়া যায়। তিনি [ঐশ্বর্য্য-গৌরবে] শ্রীপতি [লক্ষ্মীপতি] হইলেও, [অমলিন-কর্ম্মপরায়ণ বলিয়া] অ-কৃষ্ণ-কর্ম্মা;—বিদ্বদ্বর্গের অধিনায়ক হইলেও, [ভোগৈশ্বর্য্যের অধিকারী বলিয়া] মহাভোগী;—প্রতাপে অনল-সদৃশ [অগ্নিতুল্য] বলিয়া প্রতিভাত হইলেও, [কার্য্যকালে] পুণ্যশ্লোক নলের তুল্য বলিয়াই সুপরিচিত।

(১৬)

 তদীয় শরচ্চন্দ্র-মরীচিবৎ শুভ্র যশঃ[৩২] ত্রিলোকে ব্যাপ্ত হইয়া পড়িয়াছে, মনে হইতেছে যেন, [তাহা অতি শুভ্র বলিয়াই] রুদ্রদেবের [সুবিখ্যাত শুভ্র] অট্টহাস্যও[৩৩] তাহার শোভাকে ধারণ করিতে পারিতেছে না; এবং [তদীয় যশোরাশির প্ৰভাতিশয্যে] সিদ্ধাঙ্গনাগণের মস্তকার্পিত [শুভ্র] কেতকীমালাও দীর্ঘকাল দৃষ্টিগোচর না হইয়া, কেবল অলি-গুঞ্জন-রবেই অনুমেয় হইয়া রহিয়াছে।

(১৭)

 দুই ব্যক্তি দুই ব্যক্তিকে বলিয়াছিলেন,—“আমার পক্ষে তপস্যা এবং তোমার পক্ষে রাজ্য”,—সগর রাজা ভগীরথকে এইরূপ বলিয়াছিলেন; বিগ্রহপালদেবও[৩৪] নারায়ণপালদেবকে এইরূপ বলিয়াছিলেন।

মূল পাঠের টীকা

^(২)  স্রগ্ধরা।

^(৩)  শার্দ্দূলবিক্রীড়িত।

^(৪)  ইন্দ্রবজ্রা।

^(৫)  বসন্ততিলক।

^(৬)  শার্দ্দূলবিক্রীড়িত।

^(৭)  আর্য্যা।

^(৮)  অনুষ্ঠুভ্।

^(৯)  বসন্ততিলক।

^(১০)  শার্দ্দূলবিক্রীড়িত।

^(১১)  অনুষ্ঠুভ্।

^(১২)  আর্য্যা।

^(১৩)  অনুষ্ঠুভ্।

^(১৪)  বসন্ততিলক।

^(১৫)  আর্য্যা।

^(১৬)  মন্দাক্রান্তা।

^(১৭)  অনুষ্ঠুভ্।

^(১৮)  মন্দাক্রান্তা।

^(১৯)  অনুষ্ঠুভ্।

প্রশস্তি-পরিচয় ও অনুবাদ-অংশের টীকা

  1. Indo-Aryans,
  2. J. A. S. B. Vol. XLVII, p. 584.
  3. Indian Antiquary, Vol. XV, p. 304.
  4. ঐতিহাসিক চিত্র [প্রথম পর্য্যায়] প্রথম বর্ষ।
  5. ডাক্তার হুল্‌জ্ দেবপালকে এবং জয়পালকে বাক্‌পালের পুত্র বলিয়া ব্যাখ্যা করিয়া গিয়াছেন। তাহার সহিত দেবপালদেবের [মুঙ্গেরে অবিষ্কৃত] তাম্রশাসনের উক্তির সামঞ্জস্য নাই। দূতকের প্রকৃত নাম কি, তাহা নির্ণয় করিতে না পারিয়া ডাক্তার হুল্‌জ্ তাঁহার নাম “পুণ্যকীর্ত্তি” বলিয়া সিদ্ধান্ত করিয়া গিয়াছেন! তথাপি ডাক্তার হুল্‌জ্ এই তাম্রশাসনের পাঠোদ্ধারে ও ব্যাখ্যা-কার্য্যে যেরূপ অধ্যবসায়ের এবং পাণ্ডিত্যের পরিচয় প্রদান করিয়া গিয়াছেন, তাহা প্ৰশংসার্হ।
  6. “मैत्री-करुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःख-पुण्यापुण्यविषयाणां भावनात श्चितप्रसादनम्” এই [পাতঞ্জল-দর্শনোক্ত ১ পাদ ৩৩] সূত্রের পারিভাষিক শব্দগুলি স্মরণীয়।
  7. দশবল-শব্দ-সংযুক্ত লোকনাথ-শব্দ এখানে বুদ্ধদেবের নামান্তর বলিয়াই ডাক্তার হুল্‌জ্ কর্ত্তৃক গৃহীত হইয়াছে। কিন্তু পালনরপালগণের শাসন-সময়ে বরেন্দ্র-মণ্ডলের [মহাযান-সম্প্রদায়ের প্রভাব-ক্ষেত্রে] বুদ্ধদেব অপেক্ষা বোধিসত্ব-লোকনাথই সমধিক প্রতিষ্ঠা লাভ করিয়াছিলেন। সুতরাং এই শ্লোকে বুদ্ধদেবের কিম্বা লোকনাথের জয় বিঘোষিত হইয়াছে, তাহা চিন্তনীয়।
  8. লোকনাথ এবং গোপালদেব তুল্যভাবে প্রশংসিত হইয়াছেন বলিয়া, এই শ্লোকের শ্লিষ্ট প্রয়োগগুলি রচনা-কৌশলের পরিচয় প্রদান করিতেছে।
  9. ডাক্তার হুল্‌জ্ এই শ্লোকের “মৈত্রী”কে গোপালদেবের রাজ্ঞীর নাম বলিয়া অবধারণ করিয়াছেন কেন, তাহা বোধগম্য হয় না।
  10. মদনপালদেবের [মনহলি গ্রামে আবিষ্কৃত] তাম্রশাসনেও এই শ্লোকটি উৎকীর্ণ থাকায়, প্রাচ্যবিদ্যামহার্ণব শ্রীযুক্ত নগেন্দ্র নাথ বসু মহাশয়, সাহিত্য-পরিষৎপত্রিকায় [১৩০৫ সালের ২য় সংখ্যার ১৫৪ পৃষ্ঠায়] একটি মাত্ৰ অর্থ প্রকটিত করিয়া, “সরিৎ” শব্দের অনুবাদে “সরোবর”-শব্দের ব্যবহার করিয়াছেন কেন, তাহা বোধগম্য হয় না।
  11. ডাক্তার হুল্‌জ্ দুইটি অর্থের সন্ধান প্রাপ্ত হইয়াও, “কামকারি”-শব্দে কিঞ্চিৎ সংশয় প্রকাশ করিয়া লিখিয়া গিয়াছেন,—“In the case of Buddha, Kámakárin probably means Mára”. এখানে “কামকারি”-শব্দ [লোকনাথ পক্ষে] “কামক + অরি” অৰ্থাৎ “কামরূপ অরিকে”, এবং [গোপালদেব-পক্ষে] “কাম + কারি” অৰ্থাৎ “স্বেচ্ছাচারিগণকে” সূচিত করিতেছে। সুতরাং “কামকারি”-শব্দের একটি অর্থে [বোধিসত্ব] লোকনাথের “আত্মজয়”,—অন্য অর্থে গোপালদেবের “মাৎস্যন্যায়-নিবারণ” ধ্বনিত হইয়াছে। কামকারিগণের প্রভাব কতদূর প্রবল হইয়া উঠিয়াছিল, এবং কিরূপে তাহা পরাভূত করিয়া গোপালদেব শান্তি স্থাপিত করিয়াছিলেন, তাহা তারানাথের গ্রন্থে উল্লিখিত আছে। যথা,—“In Orissa, Bengal, and five other provinces of the East, every Kṣatriya, Bráhmana and merchant (Vaiçya) made himself the chief of the districts; but there was no king ruling the whole country. The widow of one of these departed chiefs used to kill every night the person who had been chosen as king, until after several years, Gopála, who had been elected king, managed to free himself, and obtained the kingdom.—Quoted in Cunningham’s Archæological Survey Reports, Vol. XV, p. 148.
  12. “शाश्वतीं प्राप शान्तिं” এই উক্তির [প্রাপ] ক্রিয়াপদ [লোকনাথ-পক্ষে] প্রচলিত অর্থে, এবং [গোপালদেব-পক্ষে] অন্তর্ভূত-নিজন্ত-বিজ্ঞাপক [প্রাপয়ামাস] অর্থে গৃহীত হইলে, শ্লিষ্ট-প্রয়োগ সর্ব্বাংশেই সার্থক হইতে পারে।

    “सर्व्वेषामेव धातूनां ण्यर्थान्तर्भाव इष्यते।
    अनुरोधात प्रयोगाणां, स्वेच्छया न कदाचन।”

     প্রয়োগানুরোধে ধাতুর অন্তর্ভূত-নিজন্ত-বিজ্ঞাপক অর্থ গ্রহণ করিবার রীতি ছিল। ধর্ম্ম সূরির এই কারিকা উদ্ধৃত করিয়া, শ্রীসৃষ্টিধরাচার্য্য “ভাষাবৃত্তির” টীকায় তাহার পরিচয় প্রদান করিয়া গিয়াছেন।

  13. এই শ্লোকে প্ৰত্যক্ষর-শ্লেষের পরিচয় বিজ্ঞাপক রচনা-কৌশল দেদীপ্যমান। কিন্তু ডাক্তার হুল্‌জ্ সমস্ত শ্লিষ্টপদের ব্যাখা লিপিবদ্ধ করিবার চেষ্টা করেন নাই;—সাহিত্য পরিষৎ-পত্রিকায় প্রকাশিত বঙ্গানুবাদেও তাহা উল্লিখিত হইতে পারে নাই। “ক্ষ্মাভর”-শব্দ [সমুদ্র পক্ষে] বিষ্ণুকেই ধ্বনিত করিতেছে। ডাক্তার হুল্‌জের নিকট তাহা প্রতিভাত হয় নাই বলিয়া, তিনি [সমুদ্র পক্ষের] অর্থ প্রকটিত করিবার সময়েও, সমুদ্রকেই [ক্ষ্মাভর] ধরা-ভারবহন-ক্ষম বলিতে গিয়া লিখিয়া গিয়াছেন,—“Whose Majesty possessed the coquettish smile (i. e., the brilliant whiteness) of the milk-ocean,—which (milk-ocean) was the birth-place of Lakshmi; which contained sea-monsters (Samakarah); which was able to bear the burden of the earth.” বলা বাহুল্য, ধরাভার-বহন-ক্ষম বলিয়া ক্ষীরোদসমুদ্রের প্রসিদ্ধি নাই; যিনি ধরা-ভরণ-ক্ষম অথবা [বরাহাবতারে] ধরাভারবহনক্ষম, সেই [ক্ষ্মা-ভর] বিষ্ণুকে বহন করিতে সমর্থ বলিয়াই, ক্ষীরোদ সমুদ্র সুপরিচিত। এখানে সেই অর্থই সূচিত হইয়াছে। “শৌর্য্যালয়”-শব্দও দুইপক্ষে দুইটি বিভিন্ন অর্থেই প্রযুক্ত হইয়াছে। ডাক্তার হল্‌জ্ তৎপ্রতি লক্ষ্য করেন নাই; সাহিত্য-পরিষৎ-পত্রিকায় প্রকাশিত বঙ্গানুবাদেও তাহা উল্লিখিত হয় নাই। এই শ্লোকে কবিকল্পনার অতিশয্য দেদীপ্যমান থাকিলেও, ইহাতে কতকগুলি ঐতিহাসিক তথ্য পরিস্ফুট হইয়া রহিয়াছে। (১) গোপালদেব রাজপুত্র ছিলেন না; পালনরপালগণের মধ্যে ধর্ম্মপালই প্রথম রাজবংশজাত রাজা; (২) তিনি সমভাবে [পক্ষপাতশূন্য-বিচারে যথাযোগ্য] কর গ্রহণ করিতেন; (৩) তাঁহার সময়ে ধরাভার বহন করা সকলের পক্ষে সহজ হইত না। কিন্তু তিনি তাহাতে সফলকাম হইয়াছিলেন; (৪) তৎকালে যে সকল সামন্ত নরপাল স্বপক্ষচ্ছেদভযে ব্যাকুল ছিলেন, তিনি তাহাদিগকে আশ্রয় দান করিয়াছিলেন; (৫) তিনি সর্ব্বদা লোক-সমাজের মর্য্যাদা রক্ষা করিতে যত্নশীল ছিলেন; এবং (৬) বীরত্বের আধার বলিয়াও প্রতিষ্ঠালাভ করিয়াছিলেন।
  14. “বলিনা”-শব্দটি দ্ব্যর্থ। ইহা এক পক্ষে বলি নামক রাজাকে, অন্য পক্ষে বলবান্‌ ধর্ম্মপালকে সূচিত করিতেছে।
  15. এই শ্লোকেও শ্লেষের অভাব নাই। ধর্ম্মপাল যে ইন্দ্রায়ুধকে পরাভূত করিয়া, তাঁহার কান্যকুব্জের রাজসিংহাসনে [আপন সামন্ত-নরপাল] চক্রায়ুধকে প্রতিষ্ঠাপিত করিয়াছিলেন, তাহা ধর্ম্মপালের শাসন-সময়ের একটি স্মরণীয় ঐতিহাসিক ঘটনা। তাহার আভাস ধর্ম্মপালের [খালিমপুরে আবিষ্কৃত] তাম্রশাসনেও [১২ শ্লোকে] প্রাপ্ত হওয়া গিয়াছে। এই শ্লোকের “আনতি”-শব্দে প্রণতি বুঝাইতে পারে; কিন্তু ডাক্তার হুল্‌জ্ এই শব্দকেই “অবতার-বিজ্ঞাপক”(?) বলিয়া গ্রহণ করিয়া, লিখিয়া গিয়াছেন,—Applied to Vishnu, Ánati seems to be used in the sense of avatàra.
  16. এই শ্লোকে বাক্‌পালের গুণ-কর্ম্মাদির উল্লেখ থাকিলেও, ইহা মুখ্যতঃ [তদীয় জ্যেষ্ঠ ভ্রাতা] ধর্ম্মপালেরই প্ৰশংসা-বিজ্ঞাপক।
  17. এই শ্লোকের ব্যাখ্যা-বিভ্রাটে পালবংশীয় নরপালগণের বংশ-বিবরণ ভ্রমসঙ্কুল হইয়া পড়িয়াছিল। “তস্মাৎ"-শব্দকে [পূর্ব্বশ্লোকোক্ত] বাক্‌পালের দ্যোতকরূপে গ্রহণ করিয়া, ডাক্তার হুল্‌জ্ এবং অন্যান্য মনীষিগণ দেবপালকে এবং জয়পালকে বাক্‌পালের পুত্র বলিয়াই গ্রহণ করিয়াছিলেন। দেবপালদেব কিন্তু তাঁহার [মুঙ্গেরে আবিষ্কৃত] তাম্রশাসনে [একাদশ শ্লোকে] আপনাকে ধর্ম্মপালের পুত্র বলিয়াই স্পষ্টাক্ষরে পরিচয় প্রদান করিয়া গিয়াছেন। বর্ত্তমান শ্লোকে সেই দেবপাল জয়পালের “পূর্ব্বজ” বলিয়া উল্লিখিত থাকায়, জয়পালকেও ধর্ম্মপালের পুত্র বলিয়াই গ্রহণ করিতে হইবে। কিন্তু অধ্যাপক কিল্‌হৰ্ণ স্বয়ং দেবপালদেবের মুঙ্গের-লিপির পাঠোদ্ধার ও বাখ্যা-সাধন করিয়াও লিখিয়া গিয়াছেন,—দেবপালদেব মুঙ্গের-লিপিতে ধর্ম্মপালের পুত্র এবং অন্যান্য লিপিতে ধর্ম্মপালের ভ্রাতার পুত্র বলিয়া উল্লিখিত থাকায়, মুঙ্গের-লিপির উক্তিকে সত্য, এবং অন্যান্য লিপির উক্তিকে ভ্রমাত্মক বলিয়া গ্রহণ করিতে হইবে। যথা—“Considering that the Mungir grant was issued by Devapála himself, it is more than probable that what is stated in it is correct, and that the other inscriptions in this particular are wrong”—J. A. S. B. Vol. LXI, p. 80. কোন তাম্রশাসনের বংশ-বিবরণই ভ্রমাত্মক বলিয়া অনুমান করা যাইতে পারে না; সকল তাম্রশাসনে একই বংশবিবরণ উল্লিখিত রহিয়াছে বলিয়াই অনুমান করা কর্ত্তব্য। এখানে “তস্মাৎ”-শব্দে ধর্ম্মপালকে গ্রহণ করিলেই, প্রকৃত অর্থ প্রকাশিত হইত। “তস্মাৎ”-শব্দের বিকৃতার্থ গ্রহণ করিয়া, দেবপালকে ধর্ম্মপালের ভ্রাতার পুত্র কল্পনা করিয়া, মনীষিগণই এই অসামঞ্জস্য সৃষ্টি করিয়া গিয়াছেন। (উইকিসংকলন টীকা: বর্তমান ঐতিহাসিক মতে তস্মাৎ শব্দে এখানে আগের শ্লোকের বাক্‌পালকেই বোঝানো হয়েছে। অর্থাৎ জয়পাল ছিলেন বাক্‌পালেরই পুত্র। পরের শ্লোকে দেবপালকে জয়পালের পূর্বজ বলা হয়েছে, সহোদর নয়। মুঙ্গের ও ভাগলপুর লিপিকে একত্রে ধরলে দেবপাল জয়পালের জেঠতুতো পূর্বজ ছিলেন। বাক্‌পাল ও জয়পাল নারায়ণপালের পূর্বপুরুষ ছিলেন বলেই এঁদের কীর্তিকলাপ এই তাম্রশাসনে এত বিশদে বলা হয়েছে। বর্তমান মতের জন্য দ্রষ্টব্য: Dynastic History Of Magadha, George E. Somers, 1977, p. 188.)
  18. বিষ্ণু [উপেন্দ্র] ধর্ম্মদ্বেষী [অসুরবর্গকে] যুদ্ধে পরাভূত করিয়া, [পূর্ব্বজ] দেবরাজ ইন্দ্রকে রাজ্যসুখ ভোগ করাইবার পৌরাণিক আখ্যায়িকা ভাগবতে [অষ্টম স্কন্ধে ১৭-১৮ অধ্যায়ে] দ্রষ্টব্য।
  19. ডাক্তার হুল্‌জ্ “ধর্ম্ম”-শব্দের যজ্ঞ-বাচক অর্থ গ্রহণ করিয়া [বিষ্ণু-পক্ষে] ধর্ম্মদ্বেষিগণকে “অসুর” বলিয়া ব্যাখ্যা করিয়া গিয়াছেন। উপেন্দ্র-পক্ষে তাহা সঙ্গত হইলেও, জয়পাল-পক্ষে তদ্বারা কাহারা “ধর্ম্মদ্বেষী” বলিয়া সূচিত হইয়াছে, তাহা অদ্যাপি নির্ণীত হইতে পারে নাই।
  20. ডাক্তার হুল্‌জ্ লিখিযা গিয়াছেন,—“The sense of this stanza seems to be that Jayapála supported the King of Prágjyotiṣa successfully against the King of Utkala.” শ্লোকের মধ্যে এরূপ আভাস প্রাপ্ত হওয়া যায় না। ইহাতে উৎকলাধিপতির পরাজয়ের, এবং প্ৰাগ্‌জ্যোতিষাধিপতির সহিত সন্ধি-বন্ধনের পরিচয় প্রাপ্ত হওয়া যায়।
  21. “उपशमित-समित्-संकथां” প্রয়োগ-নৈপুণ্যের পরিচায়ক হইলেও, যুদ্ধ-বাচক “সমিৎ” শব্দ [অমরকোষ ২৷৮৷১০৬] অপরিচিত বলিয়া স্বীকার করা যায় না। জয়পালের আজ্ঞা শ্রবণ করিয়াই, প্রাগ্‌জ্যোতিষাধিপতির যুদ্ধসংক্রান্ত [সংকথা] বাদানুবাদ উপশমিত হইয়া গিয়াছিল।
  22. এই শ্লোকের “তৎসূনুঃ” কাহার পুত্রকে সূচিত করিতেছে, তৎসম্বন্ধে এসিয়াটিক্ সোসাইটির “সেণ্টিনারী রিভিউ”-পুস্তকের ইতিহাসাংশের পরিশিষ্টে ডাক্তার হরণ্‌লি [আমগাছি লিপির সমালোচনা-প্রসঙ্গে] লিখিয়া গিয়াছেন,—“It seems clear from this grant that Vigrahapála was not a nephew, but a son of Devapála; for the pronoun “his son” (tat-súnuh) must refer to the nearest preceding noun, which is Devapála. In the Bhágalpur-grant this reference is obscured through the interpolation of an intermediate verse in praise of Jayapála, which makes it appear as if Vigrahapála were a son of Jayapála.”—Centenary Review Appendix II. P. 206. রচনা-রীতির প্রতি লক্ষ্য করিলে, প্ৰথম বিগ্রহপালদেবকে দেবপালদেবের পুত্র বলিয়াই স্বীকার করিতে হয়। দেবপালদেবও অপুত্রক ছিলেন না। তাঁহার [মুঙ্গেরে আবিষ্কৃত] তাম্রশাসনে [৫১-৫২ পংক্তিতে] রাজ্যপাল নামক তদীয পুত্র যৌবরাজ্যে অভিষিক্ত থাকিবার পরিচয় প্রাপ্ত হওয়া যায়। তিনি যে পিতার জীবিতকালেই পরলোক গমন করিয়াছিলেন, তাহার প্রমাণাভাব। গরুড়স্তম্ভ-লিপিতে [১৬ শ্লোকে] দেবপালের পরবর্ত্তী নরপাল শূরপাল নামে উল্লিখিত। সকলেই তাঁহাকে প্ৰথম বিগ্রহপাল বলিয়াই গ্রহণ করিয়াছেন। প্রথম বিগ্রহপালের একাধিক নামের এইরুপ পরিচয় প্রাপ্ত হইয়া, যুবরাজ রাজ্যপালকে, শূরপালকে এবং প্রথম বিগ্রহপালকে, অভিন্ন ব্যক্তি বলিয়াই গ্রহণ করিতে ইচ্ছা হয়। এই সিদ্ধান্ত সমীচীন বলিয়া গৃহীত হইলে, পালবংশীয় নরপালগণের প্রচলিত বংশাবলীর ভ্রমসংশোধন করিতে হইবে।
  23. যুধিষ্ঠির “অজাত-শত্রু” নামে সুপরিচিত। এখানে মগধাধিপতি বিম্বিসারের পুত্র অজাতশত্রুই সূচিত হইয়াছেন মনে করিয়া, ডাক্তার হুল্‌জ্ লিখিয়া গিয়াছেন;—“Vigrahapála himself became Ajátaçatru, i.e. ‘one whose enemies have ceased to exist.’ On this verbal play alone rests the comparison with King Ajátaçatru.” এই ব্যাখ্যা সমীচীন বলিয়া বোধ হয না।
  24. “पुरुषायुष-दीर्घानां सम्पदां” পুরুষের আয়ুষ্কাল-স্থায়ী সম্পদের পরিচয় দান করে। “পুরুষের আয়ুঃ [शतायु र्वै पुरुषः] শতবর্ষ বলিয়া সুপরিচিত,—তাহা এখানে “যাবজ্জীবন”-অর্থ জ্ঞাপন করিতেছে।
  25. পালবংশীয় নরপালগণের “জাতি” কি ছিল, তাঁহাদের শাসন-লিপিতে তাহার কিছুমাত্র উল্লেখ দেখিতে পাওয়া যায় না। তাঁহারা কিরূপ বংশে বিবাহ করিয়াছিলেন, তাহারই কিছু কিছু পরিচয় প্রাপ্ত হওয়া যায়।
  26. अष्टाभि र्लोकपालाना मात्राभि र्निर्म्मितो नृपः।”

    সুবিখ্যাত মল্লিনাথ এই স্মৃতিবাক্য উদ্ধৃত করিয়া গিয়াছেন। এখানে “লোকপাল”-শব্দ “দিক্‌পাল”-অর্থেই ব্যবহৃত হইয়াছে। মনুসংহিতায় [৭৷৩-৪] লোকপালগণের সংগৃহীত “মাত্রা” দ্বারা বিধাতাকর্ত্তৃক রাজা সৃষ্ট হইবার পরিচয় প্রাপ্ত হওয়া যায়। যথা,—

    “अराजके हि लोकेऽस्मिन् सर्व्वतो विद्रुते भयात्।
    रक्षार्थ मस्य सर्व्वस्य राजान मसृजत् प्रभुः॥
    इन्द्रानिलयमार्काना मग्नेश्च वरुणस्य च।
    चन्द्रवित्तेशयो श्चैव मात्रा निर्हृत्य शाश्वतीः॥”

    ইহাতেও অষ্ট-দিক্‌পালেরই উল্লেখ দেখিতে পাওযা যায়। ইন্দ্রাদি দশদিক্‌পালের যে পূজা প্রচলিত আছে, তাহাতে চন্দ্রসূর্য্যের পরিবর্ত্তে, ঈশান ও নিঋতি, এবং ব্রহ্মা ও অনন্ত নামক দুইটি অতিরিক্ত দিক্‌পালের পরিচয় প্রাপ্ত হওয়া যায়।

  27. এই শ্লোকটি, কিঞ্চিৎ পরিবর্ত্তিত আকারে, মহীপালদেবের এবং বিগ্রহপালদেবের তাম্রশাসনেও উদ্ধৃত হইয়াছে। তাহাতে “শ্রীর” পরিবর্ত্তে “গুণ”-শব্দ ব্যবহৃত হইয়াছে। মনুসংহিতোক্ত “মাত্ৰা”, এবং এই সকল তাম্রশাসনোক্ত “শ্রী” এবং “গুণ” একার্থ-বাচকরূপেই ব্যবহৃত হইযাছে।
  28. “ন্যায়োপাত্ত”-শব্দে “উত্তরাধিকার-সূত্ৰে প্রাপ্ত” বুঝিতে হইবে। ডাক্তার হুল্‌জ্ সেই ভাবেই ইহার ব্যাখ্যা করিয়া লিখিয়া গিয়াছেন,—“He adorned with his deeds the inherited throne.”
  29. “चेतः पुराण-लेख्यानि” একটি সুকৌশল-বিন্যস্ত প্রয়োগের নিদর্শন।
  30. সাতিবাহন রাজার কাহিনী “কথাসরিৎসাগরে” দ্রষ্টব্য। অন্ধ্ররাজগণের “সাতবাহন” উপাধি “সাতিবাহনের” নামান্তর বলিয়া বোধ হয়। যে “বৃহৎকথা” নামক গ্রন্থ অবলম্বনে “কথাসরিৎসাগর” রচিত হইয়াছিল, তাহার রচয়িতা গুণাঢ্য “সাতবাহন” রাজার সভাসদ ছিলেন বলিয়া উল্লিখিত আছে।
  31. নারায়ণপালদেবের চরিত্রে এইরূপ বিরুদ্ধগুণ-সমাবেশ দেখিতে পাওয়া যায়। রামচরিত্র-বর্ণনায় কবিগুরু ইহার পথ প্ৰদর্শন করিয়া গিয়াছেন। এই শ্লোকোক্ত “অ-কৃষ্ণ-কর্ম্মা”-পদের ব্যাখ্যায় ডাক্তার হুল্‌জ্ লিথিয়াছেন,—did not commit black deeds, (did not act like Krishna) কিন্তু কৃষ্ণ-নিন্দা রাজকবির অভিপ্রেত ছিল বলিয়া বোধ হয় না।
  32. “मालिन्यं व्योम्नि पापे यशसि धवलता वर्ण्यते हासकीर्त्त्योः” ইত্যাদি সাহিত্যদর্পণোক্ত [সপ্তম পরিচ্ছেদ] “কবিসময়-খ্যাতানি” স্মরণীয়।
  33. রুদ্রদেবের অট্টহাস্য অতি শুভ্র বলিয়াই পরিচিত। তজ্জন্য অতি শুভ্র কৈলাস-গিরিকে তাহার সহোদর বলিয়া বর্ণনা করিবার পরিচয় সাহিত্যদর্পণে [১০৷৬৯৭] প্রাপ্ত হওয়া যায়। যথা,—

    विमल एव रवि र्विशदः शशी प्रकृति-शोभन एव हि दर्पणः।
    शिवगिरिः शिवहास-सहोदरः सहज-सुन्दर एव हि सज्जनः॥”

  34. ইহাতে পুত্রহস্তে রাজ্যভার সমর্পণ করিয়া, বিগ্রহপালদেবের বানপ্রস্থ অবলম্বন করিবার পরিচয় প্রাপ্ত হওয়া যায়।